जटामांसी एक प्रमुख आयुर्वेदिक औषध है। इसे दिमागी रोगों की बूटी के नाम से भी जाना जाता है। आयुर्वेदिक औषधियों में जटामांसी के कंद, मूल का प्रयोग चूर्ण व काढ़े के रूप में तथा कंद से निकाले जटामांसी तेल के रूप में किया जाता है। इसके कंद में वोलेटाइल आयल, अल्कलॉइड्स, जटामानसिक एसिड होते है। जटामांसी का चूर्ण प्रतिदिन 3 से 6 ग्राम और इसका काढा चिकित्सक के निर्देशानुसार सेवन करना चाहिए। ज्यादा मात्रा में सेवन करने से इसके दुष्प्रभाव भी हो सकते है।
जटामांसी के औषधीय प्रयोग
अनिद्रा : अनिद्रा रोग में जटामांसी के चूर्ण का सोने से पहले किया जाता है।
मानसिक दुर्बलता : स्ट्रेस, एंग्जाइटी, टेंशन इत्यादि में जटामांसी के चूर्ण का प्रयोग खाने के लिए तथा तेल का प्रयोग सिर की मालिश, भाप लेने, स्पा आदि के लिए करना चाहिए। मेमोरी लॉस, लर्निंग डिसऑर्डर, हाइपर एक्टिव डिसऑर्डर डिप्रेशन, मिर्गी के दौरे सिर दर्द, माइग्रेन में चूर्ण लेना लाभकारी होता है।
बालों को बनाता है मुलायम : बालों को स्वस्थ, काले, लम्बे रखने में भी जटामांसी के काढ़े की सिर में मालिश करें।
तेल का प्रयोग : अन्य मसाज ऑयल के साथ मिलाकर मसाज करने पर क्रॉमिक फैटिक सिंड्रोम, लेग क्रैप्स फायदा मिलेगा।
-डॉ. राकेश नागर, असिस्टेन्ट प्रोफेसर, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान , जयपुर
जटामांसी में हैं एंटी बैक्टीरियल गुण
जटामांसी के तैल एवं कंद चूर्ण पर हुए शोधों के अनुसार जटामांसी में एंटी कैंसर, एंटीऑक्सीडेंट, हेप्टाप्राेटैक्टिव, एंटीडिप्रजेंट, एंटीइन्फ्लामेंट्री, एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं। चिकित्सकीय निर्देश में जटामांसी का सेवन अमृत के समान गुणकारी हो सकता है।