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नींद पूरी नहीं होने पर आता है स्लिप पैरालिसिस

3 वर्ष पहले
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हैल्थ रिपोर्टर जयपुर



अक्सर कई बार सोते समय बहुत से लोग बड़बड़ाने लगते हैं। नींद में हिलने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे हिल नहीं पाते और ना ही अपने हाथ-पैरों को हिला पाते हैं। कई लोग इसे डरावना सपना और इसे गंभीर बीमारी मान लेते हैं। यह केवल एक भ्रम है। सोते समय नींद में इस प्रकार की रुकावट आने को स्लीप पैरालिसिस कहा जाता है। ये स्लीप साइकिल के डिस्टर्ब और बॉडी मसल्स की टोन के खत्म होने के कारण होता है। नींद में इस तरह की रुकावट आने से स्ट्रोक या फिर किसी भी तरह की गंभीर बीमारी नहीं होती है। पेशेंट को नींद में इस प्रकार की रुकावट कई बार हो सकती है। अक्सर ये नार्कोलेप्सी के पेशेंट में पाया जाता है। नींद में यह रुकावट कुछ सैकंड से कुछ मिनट तक रहती है। ऐसा किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन ज्यादातर यह 20 से 30 साल की उम्र में होता है।

स्लीप के दो साइकिल

आरईएम और एनआरईएम स्लीप साइकिल बिगड़ने और डिस्टर्ब होने के कारण स्लीप पैरालिसिस हो सकता है। आरईएम स्लीप में मसल्स की टोन खत्म होने के कारण पेशेंट की बॉडी कुछ मिनटों तक हिल नहीं पाती है।

किन कारणों से होता है

प्रॉपर नींद नहीं लेना, जेनेटिक फैक्टर, स्ट्रैस, डिप्रेशन, एंग्जाइटी, एल्कोहल का सेवन, लेट नाइट तक फोन का यूज, स्लीप साइकिल का डिस्टर्ब होना, ओबेसिटी।

स्लीप पैरालिसिस से नहीं होता स्ट्रोक

स्लीप पैरालिसिस के दौरान कई बार पेशेंट को ऐसी चीजें दिखने लगती हैं जो आस-पास नहीं होतीं। जैसे की कमरे के कोने में किसी के खड़े होने का आभास होना। हालांकि, स्लिप पैरालिसिस को स्ट्रोक नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस दौरान पेशेंट कॉन्शस रहता है। सामान्य रूप से सांस लेता है। वह सिर्फ अपने हाथ- पैर नहीं हिला पता।

क्या करें

स्लीप पैरालिसिस कुछ सैकंड या फिर कुछ मिनटों में खत्म हो जाता है। इस समय में अगर पेशेंट खुद को हिलाने या बात करने की कोशिश करे तो भी इसे खत्म किया जा सकता है। इसके अलावा अगर पेशेंट को साइड की पोजिशन में सुला दिया जाए या फिर उससे बात की जाए तो उसे स्लीप पैरालिसिस से बाहर निकला जा सकता है। स्लीप पैरालिसिस के कारण किसी भी प्रकार के स्ट्रोक का खतरा नहीं रहता।

कैसे करें ट्रीट

स्लीप पैरालिसिस को इसके लक्षणों और पॉलीसोम्नोग्राफी से डायग्नोस किया जाता है। पोलीसोम्नोग्राफी सोते समय ब्रेन की वेव, हार्ट बीट और सांस के बारे में बताती है। इसे डायग्नोस करने के बाद पेशेंट को समझाया जाता है कि ये नार्मल है। इसका स्ट्रोक और लकवे से किसी तरह का संबंध नहीं है। पेशेंट को प्रॉपर नींद लेने की सलाह दी जाती है। इसके बावजूद भी अगर पेशेंट बार-बार डिस्टर्ब हो रहा हो तो उसे एंटी-डिप्रेशन दिया जाता है। इसके अलावा रिस्क फैक्टर को अवॉइड करने की कोशिश भी की जाती है।

-डॉ. राकेश अग्रवाल, न्यूरोफिजिशियन, जयपुर

इसमें पेशेंट ना हिल पाता है और ना ही हाथ-पैरों को हिला पाता है

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