संस्कृत शिक्षा सेवा के नए नियमों को लेकर अब नया विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में सामान्य शिक्षक और संस्कृत के शिक्षक दो गुटों में बंट गए हैं। सामान्य शिक्षकों ने राज्य सरकार को प्रजेंटेशन देकर कहा है कि सरकार का फैसला सभी सामान्य शिक्षकों के हित में है। ऐसे में रिव्यू जैसे कदम नहीं उठाएं। उधर, रिव्यू के लिए संस्कृत से जुड़े शिक्षक संगठन आंदोलन कर रहे हैं। शिक्षक संगठन सियाराम से जुड़े शिक्षक तीन दिन से शिक्षा संकुल के बाहर अनशन पर हैं। संस्कृत शिक्षा सेवा नियमों के तहत दूसरे विषयों के शिक्षक भी संस्कृत स्कूल में प्रधानाध्यापक और प्रधानाचार्य बन सकते हैं। इस मामले में राजस्थान संस्कृत शिक्षा सामान्य विषय शिक्षक संघ के सचिव नगेन्द्र आर्य ने कहा कि राज्य सरकार ने जो नए संस्कृत के नियम लागू किए है। उसकी मांग लंबे समय से सामान्य के शिक्षक कर रहे थे। अब वरियता के आधार पर संस्कृत स्कूल के शिक्षक भी प्राचार्य बन सकेंगे। संस्कृत शिक्षा में पांच हजार शिक्षक सामान्य हैं जबकि डेढ़ हजार शिक्षक संस्कृत के हैं। संस्कृत स्कूलों में सिर्फ एक विषय संस्कृत पढ़ाया जाता है और शेष सामान्य विषय हैं। ऐसे में सामान्य विषय के शिक्षकों को प्राचार्य बनने का हक देना गलत नहीं है।
राजस्थान संस्कृत शिक्षा विभागीय शिक्षक संघ के कार्यकारी प्रदेशाध्यक्ष डाॅ. रामावतार बागड़ा ने कहा कि संस्कृत के स्कूलों में अंग्रेजी, हिंदी या उर्दू के प्राचार्य रहने से संस्कृत का भला नहीं होगा। संगठन ने मंत्रिमंडलीय उपसमिति के समक्ष पक्ष रखा है कि संशोधन नियम 2018 को निरस्त किया जाए।