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मन के मंथन की कथा है समुद्र मंथन : व्यास

3 वर्ष पहले
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जैसलमेर | श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन की कथा प्रारंभ करते हुए कथा वक्ता शैलेंद्र व्यास ने बताया कि जीव मात्र इस संसार रूपी सरोवर में आकर भोग विलास रूपी जल क्रीड़ा में लग जाता है। लेकिन यह भूल जाता है कि काल उसे कभी भी पकड़ सकता है वह कभी किसी को नहीं छोड़ता है। गजेंद्र मोक्ष की कथा को समझाते हुए बताया कि जीव ही तो गजराज है और गृह रूपी काल के मुख का ग्रास बना हुआ है। यदि उसके श्राप से बचना हो तो केवल एक ही साधन है और वह है अति स्वर से भगवान को पुकारना। मनुष्य का व्यवहार हाथी स्नान जैसा ही है हाथी स्नान करने के पश्चात अपने ऊपर पुनः कीचड़ डाल देता है और मनुष्य भी सत्संग में जब तक बैठा हो तब तक ठीक है, और जैसे ही घर जाता है पुनः उसी विषय वासना का कीचड़ अपने ऊपर डाल देता है लेकिन जब संसार से ठोकर लगती है तो सांवरिए को याद करता है ।

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