श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथा वक्ता शैलेंद्र व्यास ने सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए भगवान शिव की बात को न मानकर सती के पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं को अग्नि में स्वाह होना पड़ा। कथा में उतानपाद के वंश में ध्रुव चरित्र की कथा को सुनाते हुए समझाया कि ध्रुव की सौतेली मां सुरुचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया।
परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य एवं संयम की नितांत आवश्यकता रहती है, ध्रुव द्वारा तपस्या कर श्री हरि को प्रसन्न करने की कथा को सुनाते हुए बताया कि भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं है अपना जीवन कैसा बनाना है यह निर्धारण बाल्य अवस्था में ही हो जाना चाहिए। ध्रुव चरित्र को सुनाते हुए बताया गया कि 36 हजार साल तक प्रजा की सेवा कर ध्रुव ने अंतरिक्ष में ध्रुव पद की प्राप्ति कर ली।