जैसलमेर. भागवत कथा के दाैरान सजी झांकी का दृश्य।
भास्कर संवाददाता | जैसलमेर
किशनघाट स्थित मोहनगर महाराज मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथा प्रारंभ करते हुए कथा वक्ता शैलेंद्र व्यास ने भगवान की अनेक लीलाओं में श्रेष्ठतम लीला रास लीला का वर्णन करते हुए बताया कि रास का अर्थ यह नहीं है कि एक पुरुष द्वारा अनेक स्त्रियों के साथ नृत्य किया जाए रास तो जीव का शिव के मिलन की कथा है। यह काम को बढाने की नही काम पर विजय प्राप्त करने की कथा है इस कथा में कामदेव ने भगवान पर खुले मैदान में अपने पूर्व सामर्थ्य के साथ आक्रमण किया है लेकिन वह भगवान को पराजित नही कर पाया उसे ही परास्त होना पड़ा है। रास लीला में जीव का शंका करना या काम को देखना ही पाप है। श्री कृष्ण का 11 वर्ष की बाल लीला पूर्ण कर ब्रज से विदा होकर मथुरा लीला प्रारंभ करने का भावुक प्रसंग विस्तार से सुनाते हुए बताया कि श्री कृष्ण 11 साल तक ब्रज में रहे, संसार को कंस के भय से मुक्त करने के लिए अपने प्राण प्यारेे नंद जसोदा, गोप गोपियां, गाय बछड़ों को भी छोड़ चले अर्थात जब देश पर संकट हो तो उसे संकट मुक्त करने के लिए अपने प्राणों से भी प्रिय वस्तु को छोडऩे में देर नही करनी चाहिए। श्री कृष्ण ने मथुरा प्रवेश कर कंस असुर का वध किया व नाना उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाया। केवल ज्ञान के माध्यम से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है इस भ्रांति को समाप्त करने के लिए श्री कृष्ण ने ज्ञान उद्धव जी को ब्रज में गोपियों से मिलने भेजा और वहां जब गोपियों के रोम रोम में कृष्ण प्रेम की धारा को देख ज्ञानी उद्धव जी का ज्ञान उस प्रेम गंगा में बह गया और उद्धव जी ने स्वीकार किया कि धरती में बीज बो देने से मात्र फसल व फल की प्राप्ति नहीं होती उस बोए गए बीजों पर जब तक वर्षा जल नहीं गिरता तब तक फल की प्राप्ति नहीं होती। ऐसे में केवल ज्ञान के बीज बो देने से जीवन में श्री कृष्ण की प्राप्ति नहीं होती उस पर श्रीकृष्ण प्रेम का जल बरसना जरुरी है तभी जाकर उस के दर्शन रुपी फल की प्राप्ति संभव है।