श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन की कथा प्रारंभ करते हुए कथा वक्ता शैलेंद्र व्यास ने मंगलाचरण सुनाते हुए बताया कि कथा श्रवण में सभी सवर्णों का अधिकार समान रूप से है। यह कथा जीव को परम सत्य से परिचय करवाती है और प्रत्येक व्यक्ति को उस सत्य को जानने का अधिकार है। यह कथा साक्षात कल्पवृक्ष है जिससे चारो पुरुषार्थ सिद्ध हो जाते है, केवल कथा श्रवण से ही ऐसा फल है। जिसमें गुठली व छिलका नहीं है केवल रस ही रस है और इस रस से ओत प्रोत फल का आस्वादन जीवन पर्यंत करते रहना चाहिए और इस फल का सेवन मुख से नहीं कानों से किया जाता है।
भगवान को भोग नहीं भाव प्रिय है समझाते हुए श्री द्वारकाधीश का विदुरानी के हाथों केलों के छिलकों को खाना तथा दुर्योधन के छप्पन भोग को ठुकराने के प्रसंग को भाव व विस्तार से सुनाया गया तथा भगवान के द्वारपाल जय विजय को सनकादिक ऋषियों के श्राप तथा भगवान वराह द्वारा हिरण्याक्ष असुर के वध की कथा को विस्तार से सुनाया गया। कथा के दौरान भजन गायक राजेंद्र व्यास सुंदर भजनों की प्रस्तुति दी गई।