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शिक्षकों को बच्चों की तरह 6 साल से एक ही जैसा प्रशिक्षण, डेढ़ करोड़ खर्च, नतीजा; सिर्फ बजट खर्च करना

3 वर्ष पहले
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हर साल प्रशिक्षणार्थी : 2200

महिला प्रशिक्षणार्थी : 700

शिविर पर खर्च : 35 से 40 लाख

गैर आवासीय पर खर्च :10 से 15 लाख

सुधीर थानवी / दीपक शर्मा | जैसलमेर

जिले में कक्षा 1 से 5वीं तक को पढ़ाने वाले करीब 2200 शिक्षक गर्मी की छ़ुट्टियों में बच्चों को पढ़ाने के तरीकों का प्रशिक्षण लेकर बोरियत महसूस करने लगे हैं। हालांकि यह प्रशिक्षण 2004 से चल रहे हैं लेकिन 2012 से सीसीई कार्यक्रम (गतिविधि आधारित शिक्षण प्रक्रिया) के तहत एक जैसा प्रशिक्षण हर साल दिया जा रहा है। ऐसे में पिछले छह सालों से लगातार एक जैसा प्रशिक्षण दिया जा रहा है और हर साल लगभग वही शिक्षक इसमें शामिल होते हैं। केवल नवनियुक्त शिक्षकों के लिए पहले साल यह प्रशिक्षण कुछ सीखने लायक होता है, शेष के लिए कुछ भी नया नहीं होता। हर साल आयोजित होने वाले प्रशिक्षण शिविरों को लेकर भास्कर ने वरिष्ठ शिक्षकों व शिक्षक संघ के पदाधिकारियों से चर्चा की तो उनका कहना है कि केवल खानापूर्ति साबित होते हैं ये प्रशिक्षण शिविर। किसी भी तरह की नई तकनीक सीखने को नहीं मिलती है और हर बार एक ही जैसा प्रशिक्षण दिया जाता है। कुछ एक का यह भी कहना था कि केवल बजट खर्च करना ही इन शिविरों का उद्देश्य है।

इस बार के शिविर यहां होंगे आज से शुरू, करीब 2200 शिक्षक लेंगे भाग

महिला शिक्षकों के लिए अलग से व्यवस्था नहीं, व्यवस्थाओं को लेकर हर बार रोष

प्रशिक्षण शिविरों को लेकर हर बार शिक्षक संघ विरोध दर्ज करवाते हैं। व्यवस्थाओं को लेकर शिक्षकों ने कई बार बहिष्कार व प्रदर्शन भी किए हैं। लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद भी सुविधाएं नहीं दी जाती है। इतना ही नहीं महिला शिक्षकों के लिए अलग से कोई व्यवस्था भी नहीं होती है। ऐसे में आवासीय प्रशिक्षण शिविरों में परेशानी ज्यादा हो रही है।

नए शिक्षकों को ही प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। पुराने व अनुभवी शिक्षकों को हर साल एक जैसा प्रशिक्षण देने का कोई औचित्य ही नहीं है। राणीदान सिंह भुट्टो, जिलाध्यक्ष, शिक्षक संघ राष्ट्रीय

ब्लॉक प्रशिक्षण स्थल

जैसलमेर मॉडल स्कूल जैसलमेर, राउमावि नाचना

सम राबाउप्रावि देवीकोट, केजीबी सोनू

सांकड़ा मॉडल स्कूल सांकड़ा

प्रशिक्षण शिविर केवल खानापूर्ति साबित हो रहे हैं। इतना ही नहीं महिला शिक्षकों को सर्वाधिक परेशानी होती है, उनकी सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती। प्रकाश विश्नोई, प्रदेश मंत्री, राजस्थान शिक्षक एवं पंचायती राज संघ

2004 से चल रहे प्रशिक्षण

जानकारी के अनुसार ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण शिविरों का सिलसिला 2004 से शुरू हुआ था। 2004 से लेकर 2011 तक प्रशिक्षण ऐसे ही चलते रहे। बच्चों को किस तरह पढ़ाया जाए और पढ़ाने की नई तकनीक के सुझाव आदि पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलता रहा। 2012 में सरकार ने सीसीई कार्यक्रम लागू कर दिया। उसके बाद से लगातार कक्षा 1 से 5वीं तक के बच्चों को पढ़ाने व बदले एग्जाम पैटर्न के बारे में प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

शिविरों की पड़ताल में कई बार सच आया है सामने

पूर्व में प्रशिक्षण शिविरों की कई बार पड़ताल की गई है। जिसमें शिविर स्थलों का सच सामने आया है। कई शिक्षक कुछ समय के लिए आते हैं और फिर चले जाते हैं। इतना ही नहीं शिविरों में केवल ब्रेकफास्ट, लंच व डिनर को लेकर ही चर्चा होती है, उसके अलावा खानापूर्ति के लिए कुछ समय के लिए संभागियों को प्रशिक्षण दिया जाता है।

क्या है औचित्य

शिक्षक प्रशिक्षण शिविरों का औचित्य कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। शिक्षकों के अनुसार छह दिनों के शिविरों में कुछ भी नया नहीं होता है। केवल खानापूर्ति साबित होते हैं ये शिविर। यदि प्रशिक्षण शिविरों का कुछ औचित्य होता तो अब तक शिक्षण व्यवस्था व शिक्षा का स्तर सुधर जाता। हकीकत यह है कि जैसलमेर की स्कूलों की स्थिति वही की वही है और कुछ भी बदलाव नहीं है।

जब बजट कम तो कुछ शिक्षकों को ही प्रशिक्षण

यह प्रशिक्षण शिविर बजट आधारित होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य शिविरों के लिए आने वाले बजट को खपाना है। दो साल पहले बजट कम आया तो कुछ शिक्षकों को ही प्रशिक्षण दिया गया। ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि बजट से कम खर्च करके शिविर आयोजित किए गए हो। जिले के तीनों ब्लॉक में लगे कक्षा 1 से 5वीं तक को पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए यह शिविर आयोजित किए जाते हैं। हर साल वही शिक्षक और वही प्रशिक्षण होता है। कुछ भी बदलाव नहीं।

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