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25 साल, 19 उपचुनाव; सत्ता में होते हुए भी 2-2 बार हारे कांग्रेस, शिअद-बीजेपी

3 वर्ष पहले
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शाहकोट उपचुनाव में मुकाबला रोचक हो सकता है। कारण, शाहकोट अकाली दल का गढ़ रहा है और सत्तारूढ़ कांग्रेस अपनी जीत का रथ हर हाल में आगे बढ़ाना चाहेगी। राज्य में 1994 से अब तक हुए उपचुनावों पर नजर डाली जाए तो ज्यादातर उपचुनाव उसी का हुआ, जिसकी सरकार रही। लेकिन कई बार ये ट्रेंड बदला भी है। सत्ता में रहते हुए भी पार्टियां हारी हैं। कांग्रेस और अकाली दल 2-2 बार चुनाव हार चुके हैं। शिअद दो बार कांग्रेस और कांग्रेस एक बार शिअद व एक बार आजाद से हारी है। आतंकवाद का दौर खत्म होने के बाद 1994 से अब तक 25 साल में राज्य में 19 विधानसभा उपचुनाव हुए हैं। 15 साल अकाली दल की सत्ता रही है और 10 साल कांग्रेस की। 12 में शिअद को जीत मिली है, 6 में कांग्रेस और एक उपचुनाव आजाद ने जीता। विपक्ष में रहते हुए अकाली दल ने एक बार और कांग्रेस ने 2 चुनाव जीते हैं।

शिअद को गढ़ बचाने की चुनौती, सत्तारूढ़ कांग्रेस को साख की चिता

तब ये बने थे समीकरण...

इसलिए सत्ता में रहते हारे

कांग्रेस सत्ता में थी और हार गई...

1994 अजनाला : शिअद ने चुनाव का बायकॉट किया था, पंथक नेता रतन सिंह अजनाला ने आजाद चुनाव लड़ा और जीते। सरकार पर करप्शन के भी आरोप थे। पुलिस एनकाउंटर से पंथक हलकों में नाराजगी भी थी।

1995 गिद्दड़बाहा : 1992 में अकाली दल के बायकॉट पर जीते कांग्रेस विधायक रघुबीर सिंह को चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिए जाने पर सीट खाली हुई थी। 1995 में परकाश सिंह बादल ने अपनी इस सीट पर मनप्रीत बादल को उतारा। मनप्रीत जीते।

सत्ता में रहते जब अकाली गठजोड़ हारा...

1998 अादमपुर : अकाली विधायक बापू सरुप सिंह के निधन पर सीट खाली हुई थी। शिअद ने नए चेहरे दलबीर सिंह को उतारा। कांग्रेस के कंवलजीत सिंह लाली 5 वोट से जीते।

1999 लुधियाना : 1997 में कांग्रेस के राकेश पांडे जीते। भाजपा दो दावेदारों का नामांकन रद्द हुआ। भाजपा चुनाव अफसर पर समय न देने का आरोप लगा हाईकोर्ट गई। 1999 में फिर चुनाव हुए और पांडे फिर जीते।

ऐसे समझें... तीनों प्रमुख पार्टियों के प्लस-माइनस पॉइंट्स

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सहानुभूति का मिल सकता फायदा

अकाली दल ने शाहकोट में लगातार 5 चुनाव जीते। कोहाड़ कांग्रेस लहर में भी जीतते रहे। इस लिहाज से शिअद के लिए उनके निधन से पैदा हुई सहानुभूति के बीच सीट बचाना जरूरी है। कोहाड़ के बेटे नायब सिंह कोहाड़ यहां कैंडिडेट हैं। सुखबीर बादल अब तक कई रैलियां कर चुके हैं। अगले एक हफ्ते में 80 और रैलियों का टारगेट है।

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तजुर्बा भी कम, सत्ता भी नहीं

गुरदासपुर लोकसभा सीट व निगम चुनाव में जबरदस्त हार के बाद शिअद को गढ़ बचाना चुनौती है। इतने साल राज के बाद भी इलाके में विकास सबसे बड़ा मुद्दा होने से लोगों में सिटिंग एमएलए को लेकर नाराजगी भी दिख रही है। कोहाड़ के बेटे का सियासी सफर भी न के बराबर रहा है। जबकि दूसरे कैंडिडेट इनसे ज्यादा तजुर्बे वाले हैं। सूबे में कांग्रेस सरकार होने से भी नुकसान हो सकता है।

पंथक सीट का फायदा मिल सकता, लेकिन प्रचार को काेई बड़ा नेता नहीं आया

आप के रतन सिंह काकड़ की पंथक छवि है। विरोध कोई नहीं है। सीट भी पंथक मानी जाती है।

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जीते तो होगा दो-तिहाई बहुमत

कांग्रेस के पास 77 सीटें हैं। अगर यह सीट कांग्रेस जीत जाती है तो विधानसभा में दो तिहाई बहुमत हासिल कर लेगी। ऐसे में कांग्रेस के लिए कई बिल और कानून में बदलाव करना आसान होगा। सीएम भी रैली में यही अपील कर चुके हैं कि ये सीट सिर्फ कांग्रेस के लिए ही नहीं सूबे की तरक्की के लिए भी जरूरी है।

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उपचुनाव का प्रोसेस शुरू होते ही कांग्रेस उम्मीदवार लाडी शेरोवालिया पर माइनिंग का केस दर्ज हो गया है। इसके बावजूद लाडी ही पार्टी के कैंडिडेट रहे। 2017 के चुनाव में माइनिंग का मुद्दा कांग्रेस ने ही उठाया था और अकाली दल पर गंभीर आरोप लगाए थे। अब यही मुद्दा कांग्रेस को घेरे है। विपक्ष ने माइनिंग को मुद्दा बना लिया है। जीत ही विपक्ष के दबाव से बाहर निकालेगी।

बदलता रहा ट्रेंड

15 साल सत्ता में रहा शिअद 12 बार जीता, कांग्रेस 6 बार

अपने ही उठाए मुद्दे पर घिरी पार्टी

इस बार पार्टी का कोई भी बड़ा नेता प्रचार को नहीं आया। अमर जीत थिंड समेत कई नेता पार्टी छोड़ गए।

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