सुबह गुरुवाणी से बैसाखी की शुरुआत...आईए चलते हैं मेले... देखिए
सुबह गुरुवाणी से बैसाखी की शुरुआत...आईए चलते हैं मेले... देखिए कैसे एक परिवार तलवंडी साबो यानी गुरुओं की काशी में लगने वाले सबसे बड़े मेले में माथा टेकने चल पड़ा। पति-प|ी और बच्चे सब की अपनी-अपनी इच्छा। नए-नए कुर्तों और लाचों में सजा परिवार अलग ही नजर आ रहा है। लंबा सफर कर मेले में पहुंचे। गुरुद्वारे में माथा टेकने के बाद भ्रमण। महिलाएं धीरे-धीरे चल रही हैं कि कहीं कोई धक्का-मुक्की न हो जाए जाए..कोई चिट्टा सूट बचा रहा है तो कोई आगे निकलने की होड़ में है। बच्चे उतने ही उत्साह में उछल कूद रहे हैं। मेले में कपड़े..श्रंगार और खिलौनों की दुकानें सबको आकर्षित कर रही हैं। बच्चे जलेबी खाने की जिद कर रहे हैं..। महिला साज सज्जा का सामान खरीदती हैं। मेले में एक किनारे मदारी तमाशा दिखा रहा है..भारी भीड़ के कारण बच्चे उसे देख नहीं पा रहे तो पिता उसे कंधे पर बिठाकर तमाशा दिखाता है। इसी बीच मेले के दूसरी ओर कुल्फी, पकौड़े बिकते देख बच्चे जिद करने लगे। भूख मिटी तो नजर गुड्डे गुड़ियों पर पड़ गई। इसी बीच दूर से आए अन्य रिश्तेदार भी मिल जाते हैं। वर्षों बाद हुई इस मुलाकात ने मेले का मनोरंजन दो गुना कर दिया। कुछ दूर चलते ही मेले में दो बचपन की सहेलियां मिल जाती हैं। पति की बातचीत के साथ ससुराल की अच्छाई-बुराई पर चर्चा। घूमते-घूमते सांझ ढलने लगती है और घर वापसी की तैयारी...।
पावन पर्व
बैसाखी के 5 संदेश ...
बैसाखी उत्साह, उल्लास और समृद्धि का पर्व। इनको जीवंत करने का स्थान मेला, जिसका पंजाब मेें विशेष महत्व। आइए भास्कर के शब्दों के साथ बैसाखी मेले की सैर करें...
चल आ, मेले नूं चलिए...
आ गया वैसाख चेत गया लंघ वे... कणकां दा हो गया सुनहरी रंग वे...
बागां उत्ते रंग फेरया बहार ने... बेरियां लफाइयां टाहणियां दे भार ने...
मंगलकारी | आकाश में ‘विशाखा नक्षत्र’ से शुरू होता है बैसाख महीना
ज्योतिष की दृष्टि से बैसाखी बहुत ही मंगलकारी होती है। इस दिन आकाश में ‘विशाखा नक्षत्र’ होता है इसलिये इस दिन से बैसाख महीने की शुरुआत होती है। वहीं, सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से इसे मेष सक्रांति भी कहते है। लोग स्नान और पूजा करते हैं।
बैसाखी दी बोली
पग्ग बन्न के जाणा ए मेले विच...
तख्त श्री दमदमा साहिब, तलवंडी साबो में चल रहे बैसाखी के मेले में दस्तार सजाते युवक। इस मेले लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
, जालंधर
साजना | अत्याचार के अंत के लिए खालसा पंथ की स्थापना हुई
13 अप्रैल,1699 को बैसाखी के दिन ही श्री केसगढ़ साहिब आनंदपुर में दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगल शासकों के अत्याचार को समाप्त करने के लिए ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की और तभी से नाम के आगे ‘सिंह’ लगाने की परंपरा शुरू हई।

सद्भावना | गुरु गोबिंद सिंह ने भिन्न जाति के ‘पंज प्यारों’ को सजाया
दया सिंह, धर्म सिंह, मोहकम सिंह, साहिब सिंह व हिम्मत सिंह ने पंथ की स्थापना के लिए अपने शीश भेंट किए। गुरु गोबिंद सिंह ने सभी को एक ही अमृत पात्र से अमृत छका ‘पांच प्यारे’ सजाए। ये पांच प्यारे भिन्न-भिन्न जाति और स्थान के थे।
शनिवार, 14 अप्रैल, 2018
बैसाख आ गया है... चैत्र का महीना निकल गया है, गेहूं की फसल का रंग सुनहरा हो गया है। बागों में बहार का रंग चढ़ा हुआ है। फलों से लदी बेरियां झुक गई हैं।
परंपरा | गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु गद्दी गुरुग्रंथ साहिब को सौंपी
मानव कल्याण के लिए पिता, गुरु तेग बहादुर साहिब जी, मां और चारों बेटों का बलिदान करने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी ने धर्म की रक्षा के लिए गुरु गद्दी गुरुग्रंथ साहिब को सौंपी और व्यक्ति विशेष की अराधना ही निषिद्ध कर दी।
मेलों से बढ़ी संस्कृति, बाजार भी मिला
सामाजिक सुधार हुआ, खरीद बिक्री की व्यवस्था बनती गई
मेलों का वजूद उन हाट-बाजारों से पैदा होता है, जहां लोग अपने गांवों के आसपास रोजमर्रा की वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे। उस वक्त मुद्रा का प्रयोग नहीं होता था। नतीजतन लोग बार्टर सिस्टम (वस्तु के बदले वस्तु) के जरिए लेनदेन करते थे। बाजार आगे बढ़ा तो उसमें हरेक तबके का आदमी अपनी-अपनी वस्तुएं लेकर आने लगा। जैसे कि किसान, अनाज, जुलाहा कपड़े, तेली तेल, कुम्हार बर्तन, बढ़ई लकड़ी के सामान, लुहार लोहे का आयटम। मानव सभ्यता में और विकास हुआ तो लोग खुशी मनाने के लिए इकट्ठे होने लगे और क्रय-विक्रय की व्यवस्था की नींव यहीं से पड़ी। सामाजिक ढांचा तैयार होने लगा, इस ढांचे को पूरी तरह से परिपक्व होने में सदियां लग गईं।
(जीएनडीयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. हरमहेंद्र बेदी और इतिहासकार सुरिंद्र कोछड़ से बातचीत पर आधारित)
पंजाब के मशहूर मेले...जिनमें मिलती है विरसे की झलक
तलवंडी साबो का बैसाखी मेला
मुक्तसर का माघी मेला
किला रायपुर में ग्रामीण खेल
पटियाला का सरस मेला
सरहिंद में शहीदी जोड़ मेला
कंटेंट: आशीष चौरसिया, फोटो : एसएस सोनू डिजाइन : विजय मौदगिल, नरेंद्र डोगरा।
बोली का अर्थ-
आनंदपुर साहिब का होला मोहल्ला
सरहिंद में रोजा शरीफ
जालंधर में बाबा सोढल का मेला
शुकराना| कल्याण और समृद्धि के लिए किसान ईश्वर को धन्यवाद देते हैं
बैसाखी रबी फसल के पकने का प्रतीक है। पंजाबी लोग इसे ‘फसल कटाई त्योहार’ के रूप में मनाते हैं। किसान इसे ‘धन्यवाद दिवस’ के रूप में भी मनाते हैं। इसके पीछे का कारण यह है कि प्रचुर मात्रा में उपजी फसल के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते हैं।
सूफियों के समागम हुए भंगड़ा, गिद्दे की धूम हुई
अध्यात्म का उद्भव भी मेलों से हुआ। जहां-तहां संत-महापुरुषों ने भक्ति को बढ़ावा दिया तो उनके साथ लोग जुड़ते गए । वक्त बदलता रहा और 12वीं सदी तक आते-आते एक बड़ा बदलाव आया। सू्फियों के डेरे पर लोगों का मजमा लगने लगा। मेले से ही लोगों पर सांस्कृतिक और धार्मिक रंग और गहरा हुआ। पंजाब में बाबा फरीद, बाबा बुल्ले शाह, श्री गुरु नानक देव जी ने भी कई जगहों पर मेलों का जिक्र किया है। कबीर दास ने तो यह कह कर कि कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर... से स्पष्ट किया कि उनके काल में बाजार पनप चुका था। इसी के साथ लोक नृत्य भंगड़ा, गिद्दा, पहनावा परवान चढ़ने लगा। हर मेले इनका आयोजन होता। हर वर्ग के लोग इसमें शाामिल होते थे।