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अजीत सिंह ने ओलंपिक में ब्रांज जीता, बेटे ने भी 2 टूर्नामेंट खेले

3 वर्ष पहले
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ओलंपियन अजीत सिंह की पूरी फैमिली हॉकी को समर्पित है। पाकिस्तान गुजरांवाला से फिरोजपुर आने के बाद पिता, चाचा, चचेरे भाइयों ने भी हॉकी खेली और बड़े भाई हरमीक सिंह, बेटे गगनअजीत सिंह ने ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया। ओलंपियन गगनअजीत सिंह के बेटे जोरावर सिंह ने अभी स्कूल जाना शुरू किया है लेकिन दादा अजीत सिंह ने जोरावर को 2036 में ओलंपिक खिलाने का एक बड़ा सपना देखा है।

1972 ओलंपिक में ब्रांज मेडलिस्ट टीम में अजीत सिंह भी शामिल थे और टीम की कप्तानी बड़े भाई हरमीक सिंह ने की थी। इससे पहले 1936 ओलंपिक में ध्यानचंद टीम के कप्तान थे और उनके भाई रूप सिंह टीम में प्लेइंग प्लेयर थे। देश की हॉकी में ध्यानचंद उनके भाई रूप सिंह व बेटा अशोक कुमार ने ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने वाली फैमिली थी। लेकिन अजीत सिंह उनके भाई हरमीक सिंह और गगनअजीत सिंह ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करके इतिहास बनाया। 1976 में हुए ओलंपिक के बाद अजीत सिंह ने हॉकी को अलविदा कह दिया। अजीत सिंह ने कहा कि उन्हें दुख है कि आज कई पुराने हॉकी प्लेयर अपने बच्चों को हॉकी से दूर कर रहे हैं। जिस खेल ने इतना मान-सम्मान दिया, हमें उसके लिए कुछ करना चाहिए और हॉकी को जिंदा रखने के लिए अपनी नई पीढ़ी को इसमें जरूर भेजना चाहिए।

कहा मेरा सपना- पोता जोरावर सिंह देश के लिए 2036 ओलंपिक खेले

हॉकी की शुरुआत

डिस्ट्रिक फिरोजपुर बस्ती गोबिंद नगर में 2 मार्च, 1951 को जन्में अजीत सिंह ने घर से ही हॉकी की शुरुआत की। पिता सोहन सिंह ने कॉलेज स्तर तक हॉकी खेली व चाचा साहिब सिंह इंडियन हॉकी टीम के खिलाड़ी रहे हैं। साहिब सिंह ही फिरोजपुर में हॉकी की शुरुआत करने वाले थे और इन्हें हॉकी का बोहड़ कहा जाता है। अजीत सिंह ने जब होश संभाला, तभी हॉकी की शुरुआत की। मालवा खालसा हाई सेकेंडरी स्कूल फिरोजपुर में पांचवीं क्लास से हॉकी की शुरुआत की और 10वीं तक इसी स्कूल से फार्वर्ड खिलाड़ी के रूप में डिस्ट्रिक, स्टेट व स्कूल नेशनल गेम्स में हॉकी खेली और 1968 में पंजाबी की तरफ से जूनियर नेशनल हॉकी चैंपियनशिप खेली। अजीत सिंह कहते हैं- हॉकी खिलाड़ी बनने के पीछे उनकी मां सतवंत कौर की भी अहम भूमिका है।

़सरकार खिलाडि़यों को बनता सम्मान दे : 1972 ओलंपिक में देश के लिए ब्रांज मेडल व 1972 ओलंपिक टीम के सदस्य रहे अजीत सिंह को अभी तक न केंद्र और न ही पंजाब सरकार ने अवॉर्ड देकर सम्मानित नहीं किया है। कहते हैं- दुख है कि देश के लिए मेडल जीतने के बावजूद सरकारें खिलाड़ियों को उनका सम्मान नहीं देतीं। जिससे खिलाड़ियों में निराशा है।

चोट लगने के बावजूद टीम के लिए खेले

1970-71 में दिल्ली के शिवासी स्टेडियम में नेहरू मेमोरियल हॉकी टूर्नामेंट के सेमिफाइनल में कंबाइंड यूनिवर्सिटी की तरफ से खेलते हुए नार्दन रेलवे से मैच खेला गया। इसमें ओलंपियन मुखबैन सिंह की हॉकी अजीत सिंह के मुंह पर लगी। बावजूद इसके वे फर्स्ट एड लेकर टीम की तरफ से खेले और मैच 0-0 पर ड्रा रहा। बाद में उन्हें अस्पताल ले गए, जहां 12 टांके लगे और 24 घंटे बाद होश आया। इस दौरान दोनों टीमों में दोबारा मैच हुआ और कंबाइंड यूनिवर्सिटी की टीम 1-0 से हार गई। होश आने पर अजीत सिंह को पता चला तो वे काफी दुखी हुए।

1973 रेलवे मंडल फिरोजपुर में कॉमर्शियल डिपार्टमेंट में जॉइन किया और 28 साल तक फिरोजपुर में चीफ इंस्पेक्टर टिकट के पद पर रहने के बाद 31 मार्च, 2011 को रिटायर हुए। इस दौरान रेलवे की तरफ से कई अवॉर्ड देकर सम्मानित किया गया।

अजीत

सिंह

जॉब

फैमिली

प|ी : बलजिंदर कौर खुद हॉकी व एथलेटिक्स प्लेयर रही हैं।

बड़ा बेटा : गगनअजीत सिंह, हॉकी ओलंपियन हैं और मौजूदा समय में लुधियाना, पंजाब पुलिस में डीसीपी हैं। प|ी आजना, पोती सायरा व पोता जोरावर सिंह।

छोटा बेटा : अमनअजीत सिंह, प|ी किरणदीप व पोता दिलावर सिंह, न्यूजीलैंड में सेटल है।

चचेरे भाई : तीनों हॉकी खिलाड़ी रहे हैं। एचएन सिंह लाडी डीएसओ रिटायर्ड, भोपाल सिंह व कुलजीत सिंह बीएसएफ में डिप्टी कमांडेंट रिटायर्ड हैं।

मन में था बेटे गगन के साथ जुड़े मेरा नाम : ओलंपियन अजीत सिंह ने बताया कि पहले ही सोचा था कि जब भी उनके घर बेटा होगा तो वह उसे हॉकी खिलाड़ी बनाएंगे और बेटे के साथ मेरा नाम जुड़ेगा। तभी गगन के साथ मेरा नाम जुड़ा और गगनअजीत सिंह ने देश के लिए हॉकी खेली और 2000 व 2004 ओलंपिक में भारतीय टीम के सदस्य रहे।

1972 व 1976 ओलंपिक...1936 के बाद 1972 ओलंपिक में इतिहास दोहराया गया। भारतीय टीम के कप्तान अजीत सिंह के बड़े भाई हरमीक सिंह बने जबकि अजीत सिंह भी बतौर प्लेयर टीम में शामिल रहे। 1936 में ध्यान चंद व उनके भाई रूप सिंह भी टीम में थे। 1976 कनाडा ओलंपिक में भी अजीत सिंह भारतीय टीम के सदस्य रहे। टीम को 7वीं पोजीशन मिली। लेकिन भारत के पहले मैच में अर्जेंटीना के खिलाफ एस्ट्रोटर्फ मैदान पर 15 सेकेंड में गोल करने का रिकॉर्ड अजीत सिंह ने अपने नाम किया। उन्होंने कहा कि टीम की हार का मुख्य कारण था कि भारतीय खिलाड़ियों ने इससे पहले कभी एस्ट्रोटर्फ मैदान पर नहीं खेला था।

इंडिया टीम तक का सफर

1970 में अजीत सिंह ने स्पोर्ट्स कॉलेज जालंधर में हॉकी खिलाड़ी के रूप में एडमिशन ली? मन में फिरोजपुर की तरफ से खेलने की चाहत लिए अजीत सिंह ने 1970 में आरएसडी कॉलेज में प्री-यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। वहीं उन्होंने कॉलेज में हॉकी टीम बनाई और पहली बार कॉलेज पंजाब यूनिवर्सिटी चैंपियन बना। इसके बाद अजीत सिंह पंजाब यूनिवर्सिटी व इंटर यूनिवर्सिटी टीम के कैप्टन बने। उसी साल कंबाइंड यूनिवर्सिटी की तरफ से सिलेक्शन हुई और ऑस्ट्रेलिया टूर किया। 1972 में बंगाल के मोहन बंगान क्लब की तरफ से जालंधर पीएपी में हुई नेशनल चैंपियनशिप खेली, जिसमें टीम को चौथा स्थान हासिल हुआ। 1973 हॉलैंड वर्ल्ड कप में सिल्वर मेडल, 1974 ईरान एशियन गेम्स के फाइनल में सिल्वर मेडल, 1973 से 1978 तक रेलवे की तरफ से नेशनल खेली, जिसमें 1974 से 1978 तक लगातार चैंपियन बने।

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