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खिड़कियां खोलो कि आए फिर कोई ताजी हवा...

3 वर्ष पहले
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जमशेदपुर | प्रगतिशील लेखक संघ जमशेदपुर की ओर से सीपीआई आॅफिस साकची में रचना गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें रचनाकारों ने कहानी, संस्मरण, गजल व कविता का पाठ किया। वरिष्ठ कथाकार जयनंदन ने ‘कवच’ शीर्षक कहानी का पाठ किया। ग्रामीण पृष्ठभूमि की यह कहानी एक ऐसी लड़ाकू वृद्धा की है, जिसके जेठ के लड़के ने उसकी जमीन हड़प ली थी। वह इस अन्याय के प्रतिरोध में गालियों का सहारा लेती है। अपनी बहुओं का चुनाव भी वह इसी आधार पर करती है कि वे भी उसकी तरह गालियां देने में उस्ताद हों। गोष्ठी में कथाकार कमल ने अपनी यूरोप यात्रा का संस्मरण सुनाया। डॉ. सुनीता देवदूत सोरेन ने अपनी कविताएं सुनाई, जिनमें स्त्री मन की आकांक्षाओं तथा आदिवासी समाज की पहचान के सवाल को अभिव्यक्ति मिली। डाॅ. अहमद बद्र ने इसी भावना को शेर के जरिए जाहिर किया- खिड़कियां खोलो की आए फिर कोई ताजी हवा, देखते हैं रोकता है कैसे दरवाजा हवा।

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