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रोजा खुलने से आधा घंटा पहले तक मोहल्ले के घरों में बांटी जाती थी इफ्तारी

3 वर्ष पहले
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आज का जवाब काजी-ए-शहर मौलाना सउद आलम कासमी, इमारत-ए-शरिया जमशेदपुर के प्रमुख दे रहे हैं।

Q. कोई व्यक्ति ऐसा काम जान बूझकर करे, जिससे रोजा टूट जाए तो क्या हुक्म है?

A . जान बूझकर रोजा तोड़ने पर कफ्फारा देना होगा।

Q.क्या मुस्लिम के लिए सिर्फ रमजान में जकात वाजिब है?

A.जकात रमजान के दूसरे महीने में भी वाजिब हो सकती है।

Q.क्या रमजान के महीने में अपने मरहूमीन के लिए कुरआन पढ़ना सही होगा?

A.रमजान में कुरआन पढ़ने का बहुत सवाब है। मरहूमीन के लिए कुरआन पढ़ने में कोई हर्ज नहीं।

Q.क्या रोजे की हालत में ब्लड टेस्ट करवाना सही है?

A.जी हां, सही है, रोजे की हालत में ब्लड टेस्ट करवा सकते हैं।

Q.क्या उलटी आने से रोजा टूट जाता है?

A.उलटी खुद से आई है तो रोजा नहीं टूटेगा, चाहे मुंह भर के ही क्यों न हो।

सिटी रिपोर्टर जमशेदपुर

रमजान में इफ्तारी खैर-ओ-बरकत की मानी जाती हैै। पहले गरीबों और जरूरतमंदों को दिल खोलकर इफ्तार करवाया जाता था। मस्जिदों के साथ ही गरीबों के घरों में पकवान भेजे जाते थे। समय के साथ तस्वीर बदल चुकी है। आज तो ज्यादातर घरों में हल्की-फुल्की इफ्तारी ही बनती है। बाकी सबकुछ बाजार से आता है। मस्जिद में रोजेदारों के लिए भी बाजार से इफ्तारी भेजने का चलन चल पड़ा है।

मानगो की रहने वाली असिफी बी बताती हैं,पहले घर की सभी महिलाएं और लड़कियां दोपहर से ही किचन में जुट जाती थीं। रोजा खुलने से आधा घंटा पहले मोहल्ले के घरों में इफ्तारी बांटी जाती थी। इसके बाद मस्जिद भेजी जाती। इसमें आम तौर से फुल्की, चिप्स, पापड़, आलू, अमरूद और केले के कचालू, मटर-पुलाव, आलू-पूड़ी, खस्ता समोसा हर रोज पकाए जाते थे। वहीं बिरयानी और कबाब-पराठा भी घर में ही बनाकर मस्जिद भेजा जाता था।

पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध में फार्मेलिटी भर रह गया इफ्तारी बांटने का चलन

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रमजान में होते हैं तीन अशरा रमजान में होते हैं तीन अशरा

रमजान के रोजे की फजीलत अलग-अलग है। रमजान में तीन अशरा होते हैं। रमजान के शुरुआती 10 दिन को पहला अशरा, इसी तरह दूसरे दस दिन को दूसरा अशरा और आखिरी 10 दिनों को तीसरा अशरा कहा जाता है। पहला अशरा रहमत का, दूसरा मगफिरत (माफी) का होता है। इसमें रोजेदारों के गुनाह की मगफिरत होती है। तीसरा अशरा निजात (राहत) का कहा जाता है।- मौलाना हाफिज रियाजुद्दीन

अपनों संग इफ्तार

अब परिचितों और वीआईपी को करवाते हैैं इफ्तार

तब सिर्फ रोजा रखकर रमजान का हक अदा करने का चलन नहीं था, बल्कि उसके असल मकसद को निभाया जाता था। आज तो फार्मेलिटी ज्यादा है। यह सब पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध की वजह से हो रहा है। आज इफ्तार तो खूब करवाए जाते हैं, लेकिन ज्यादातर में परिचितों और वीआईपी लोगों को बुलाने की होड़ रहती है।

यह तस्वीर मोहम्मद इनाम धतकीडीह, आसिफ खान रिजवी कबीर नगर कपाली व मोहम्मद वसीम ने चक्रधरपुर से भेजी है।

खुशियों की सेल्फी

यह सेल्फी हमें मो. शाबान जाकिरनगर मो. हाकिम ने बालीगुमा से भेजी है।

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