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दलमा राजा ने पटमदा व बोड़ाम के लोगों से कहा शिकार किया तो देना होगा गर्दन का हिस्सा

3 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर जमशेदपुर

दलमा राजा राकेश हेंब्रम बुधवार को दलमा पहाड़ की तलहटी पर बसे पटमदा और बोड़ाम गए। एक दशक पहले वन विभाग ने सेंदरा मनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। तबसे वन विभाग की निगाह में आने से बचने के लिए बोड़ाम और पटमदा के ग्रामीणों ने दलमा राजा को शिकार करने के एवज में जानवर की गर्दन देना बंद कर दिया था। दलमा राजा को सूचना मिली कि सेंदरा पर्व में पटमदा और बोड़ाम के जंगल से लगे गांवों में खूब शिकार होता है। राकेश हेंब्रम ने गांव वालों से कहा- वे दलमा राजा हैं। परंपरा के तहत दलमा जंगल में शिकार करने पर दलमा राजा को पशु या पक्षी की गर्दन देनी है। अगर गर्दन नहीं दे सकते तो फिर शिकार से परहेज करें।

दलमा राजा ने मंगलवार को दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी के मानगो कार्यालय में जाकर रेंजर आरपी सिंह से मुलाकात की थी। रेंजर आरपी सिंह का कहना था कि दलमा जंगल में विशु शिकार पर्व की परंपरा निभाई जानी चाहिए, न कि शिकार होना चाहिए। इधर परंपरा निभाई जाती है। पटमदा व बोड़ाम में सेंदरा पर्व के नाम पर जंगल में शिकारी प्रवेश करते हैं। यह रुकना चाहिए। दलमा राजा राकेश हेंब्रम को भी मलाल था कि पटमदा और बोड़ाम से उन्हें न शिकार का हिस्सा मिलता है, न ही वहां के लोग शिकार का हिस्सा देने में परेशानी होने के बाबत कुछ बताते हैं। इस नाते दलमा राजा ने पटमदा और बोड़ाम के गांवों में अपना संदेश दे डाला। उन्होंने पटमदा व बोड़ाम के गांवों में कुछ स्वयंसेवकों को भी शिकार पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी है।

आदिवासियों के विकास के लिए राज्य सरकार ग्राम सभा में फंड भेजें, योजना हम बनाएंगे - हांसदा

पंडित रघुनाथ मुर्मू ऑडिटोरियम दिशोम जाहेरथान करनडीह में विचार गोष्ठी हुई

जमशेदपुर माझी परगना महाल जुगसलाई की ओर से पंडित रघुनाथ मुर्मू ऑडिटोरियम दिशोम जाहेरथान करनडीह में बुधवार को विचार गोष्ठी आयोजित की गई। समारोह की अध्यक्षता जुगसलाई तोरोप परगना के बाबा दशमत हांसदा ने की। इसमें सेंदरा पर्व और आदिवासी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की दशा व दिशा पर चर्चा हुई। बकौल हांसदा, सेंदरा और शिकार का अर्थ अलग-अलग है। सेंदरा हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। इस परंपरा को हमारे पूर्वज सदियों से निर्वाह करते आ रहे हैं। इसका पालन करना हमारा परम कर्तव्य है। सेंदरा के दिन फोदलोगोड़ा पारडीह में दोपहर एक बजे से लोकगीत दरबार अखाड़ा का आयोजन होगा। इसमें ज्यादा से ज्यादा आदिवासी समाज की नई पीढ़ी को पारंपरिक औजार के साथ शामिल होने की अपील की है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार गलत स्थानीय नीति बनाकर आदिवासियों के अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास कर रही है। सरना सनातन एक है। आदिवासी हिंदू हैं। इस तरह की बातें बोलकर लोगों को दिर्दिभ्रमित किया जा रहा है। धार्मिक आस्था को ठेस पंहुचाया जा रहा है। झारखंड सरकार की गलत स्थानीय नीति को निरस्त किया जाए। झारखंड के सभी सरकारी नौकरियों में खतियान को अनिवार्य किया जाए। इसके लिए आदिवासी विकास समिति व ग्राम विकास समिति का जोरदार विरोध किया जाएगा। मौके पर माझी युबराज टुडू, सुतरेत मधु सोरेन, दुर्गाचरण मुर्मू व नवीन मुर्मू आदि मौजूद थे।

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