अब ट्रेनों में इको-फ्रेंडली थालियों में यात्रियों को खाना परोसा जाएगा। पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल (जैव अपघटनीय) और एक बार इस्तेमाल की जा सकने वाली ये थालियां गन्ने के वेस्ट मटेरियल (अपशिष्ट) से बनाई जाएंगी। एक जून से रेलवे बोर्ड इसकी शुरुआत राजधानी, दूरंतो जैसी ट्रेनों से करने जा रहा है।
रेलवे बोर्ड के सूचना एवं प्रचार निदेशक वेद प्रकाश के अनुसार, अभी ट्रेनों में ठोस प्लास्टिक, थर्माकोल व पॉलीमर से बनीं थालियां उपयोग में लाई जाती हैं। कई बार ये थालियां ठीक से साफ नहीं होतीं। खाने में उपयोग होने वाले तेल की परत थालियों पर जमी रह जाती है, जिससे यात्री नाराज होते हैं। ये थालियां खराब होने पर आसानी से नष्ट भी नहीं होती हैं। इनमें अलग से दाल, सब्जी, चावल अन्य वस्तु रखने के लिए खांचे भी नहीं होते। इस कारण एल्युमिनियम फ्वाइल की पैकिंग में अलग से दाल, चावल व सब्जी देना पड़ता है। ये सारी समस्याएं अब खत्म हो जाएंगी। इको-फ्रेंडली थालियों में दाल, चावल व सब्जी परोसने के लिए खाने बने होंगे। एक बार इस्तेमाल में आने के बाद इनका दोबारा इस्तेमाल नहीं होगा। बायोडिग्रेडेबल होने के कारण ये प्राकृतिक परिस्थितियों में खाद में तब्दील हो जाएंगी।
आईआरसीटीसी कराएगा उपलब्ध
इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन (आईआरसीटीसी) पहले शताब्दी, राजधानी व दूरंतो एक्सप्रेस में ये थालियां उपलब्ध कराएगा। नई दिल्ली-कोलकाता राजधानी एक्सप्रेस में इन थालियों का ट्रायल शुरू कर दिया गया है। इसके सफल होने के बाद 34 शताब्दी, राजधानी व दूरंतो एक्सप्रेस में इनका उपयोग शुरू होगा। इसके बाद पेंट्रीकार वाली सुपरफास्ट व एक्सप्रेस ट्रेनों इन थालियों का उपयोग किया जाएगा।
गन्ना किसानों
को फायदा
ट्रेनों में इन थालियों के उपयोग से गन्ने के वेस्ट मटेरियल की मांग बढ़ जाएगी। अभी ज्यादातर किसान गन्ने की फसल काटने के बाद गन्ने के रस से गुड़ बना लेते हैं और बाकी के मटेरियल जला देते हैं।