व्यक्ति के पास छोड़ने के लिए संसार है और पाने के लिए संयम
अपनी आत्मा पर नियंत्रण रखना संयम है। छोड़ने के लिए संसार है और पाने के लिए संयम है। संसार रूपी दलदल से बाहर निकलना ही संयम है। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं ने सभी वैभव, विलासिता का त्याग कर संयम ग्रहण किया और 24 तीर्थंकर बन गए।
यह बात मुनिराज पीयूषचंद्रविजयजी ने पीपली बाजार पौषधशाला में धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा मुनि से बड़ा कोई पद नहीं। नाम के आगे यदि मुनि लग गया, याने महान पद मिल गया। नवकार मंत्र के पांचवें पद में स्थान पा लिया। संत दर्शन भी पुण्योदय से होता है। संत बनो या न बनो, लेकिन शांत अवश्य बनो। उपाध्याय दिव्यचंद्रविजयजी ने कहा साधना अाराधना से जुड़ेंगे, उतना ही कल्याण होगा। दान, तप, शील, भाव, ये सभी अगर मजबूत है तो आत्मा का कल्याण होगा। मुनिराज रजतचंद्रविजयजी ने भी धर्मसभा में अपने विचार रखें। रात में चौबीसी हुई। जिसका लाभ राजेंद्र ऋषभ महिला मंडल, आनंदीलाल, प्रतीककुमार लोढ़ा परिवार रहे।
धर्मसभा को संबोधित करते मुनिश्री।