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Rs.24 लाख के स्टापडेम में एक बूंद भी पानी नहीं

3 वर्ष पहले
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24 लाख रुपए खर्च कर बनाए गए स्टापडेम में एक बूंद भी पानी नहीं है। इससे क्षेत्र के लोग भी चकित हैं कि शासन द्वारा ग्रामीणों की सुविधा के लिए लाखों रुपए स्वीकृत कर सुविधायुक्त कार्य कराती है, लेकिन ठेकेदार एवं विभागीय अधिकारियों के मिलीभगत से प्रायः योजनाएं फेल हो जाती है। कुछ ऐसा ही मामला फरसाबहार ब्लॉक के भेलवां पंचायत के मेड़ेर के जोरण्डाझरिया नाला में सिंचाई विभाग द्वारा बनाए गए स्टाप डेम का है।

जिला खनिज संस्थान न्यास निधि से 24 लाख 12 हजार की लागत से स्टाफ डेम का निर्माण किया गया है। जहां आज की स्थिति में वहां 24 तो क्या एक बूंद भी पानी नहीं है। वहीं डेम के पश्चिम तरफ मेढ़ भी नहीं है। इससे डेम में रहने वाला पानी खेतों मे चला जाता है। डेम के मुख्य मेढ़ में किए गए पल स्तर चटकने लगा है। इसी से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्रामीणों के सुविधा देने के उद्देश्य से बनाए जा रहे निर्माण कार्यों की क्या स्थिति हो रहीं है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि नाला में पानी बहते रहने तक स्टाप डेम में पानी रहता है। पानी का बहाव बंद होने पर पानी नहीं रहता है। अब सवाल ये है कि, बरसात के समय हमेशा पानी बहता है और गर्मी में नाला सूखने के बाद पानी का भराव नहीं रहता है तो शासन के 24 लाख रुपए खर्च करने का क्या औचित्य है। पानी की ज्यादा जरूरत गर्मी के दिनों में ही होती है। बरसात में तो पानी की समस्या ही नहीं रहती है। यह स्थिति सिर्फ इस स्टापडेम का नहीं है, बल्कि सिंचाई विभाग द्वारा बनाए गए फरसाबहार ब्लाक के कई डेमों का है।

जल संकट

फरसाबहार के भेलवां पंचायत के मेड़ेर के जोरंडाझरिया में बना स्टाप डेम का नहीं मिल रहा लाभ, ग्रामीणों को हो रही सिंचाई में समस्या

नाले पर बना यह स्टापडेम पानी रोक नहीं पाता है

डेम का निर्माण अच्छी तरह से किया गया है, लेकिन स्टाप डेमों में संबंधित नालों में पानी बहते तक पानी रहता है और नाले में पानी बहना बंद होने पर पानी नहीं रहता है। डीआर दर्रो, कार्यपालन अभियंता, जल-संसाधन विभाग, जशपुर

आरोप: शासन के पैसों का हो रहा बंदरबांट

स्टाप डेम निर्माण के नाम पर शासन द्वारा लाखों रुपए दी जाती है, लेकिन संबंधितों द्वारा निर्माण में सारी राशि खर्च की जाती है तो, निश्चित ही पानी रहता। निर्माण कार्यों के लिए जारी पूरी राशि खर्च कर रहे हों, ऐसा नहीं लगता है। ग्रामीणों का कहना है कि उच्चाधिकारियों द्वारा खुदाई किए गए जमीन को नापकर उचित आंकड़ा निकालकर खर्च की गई राशि का आंकड़ा निकाल लें तो, वास्तविकता सामने आ सकती है।

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