परिवहन विभाग के अधिकारियों की आंखों के सामने जिला मुख्यालय से स्लीपर बसों के नाम पर टैक्स चोरी का खेल चल रहा है। टूरिस्ट परमिट के नाम पर स्लीपर कोच की एक सीट का 300 रुपए टैक्स चुकाया जा रहा है। जबकि बसों का इस्तेमाल मजदूरी के लिए गुजरात जाने वालों को छोड़ने में लिया जा रहा है। स्लीपर की एक सीट पर कम से कम चार सवारियां बैठाई जा रही हैं। यात्री परमिट की बसों में प्रति सीट टैक्स 700 रुपए है। इस लिहाज से चार सवारियों का 3200 रुपए टैक्स बनता है। हालांकि यह तो केवल एक आंकलन है, नियमानुसार तो इन बसों में इस तरह यात्री ढाेना ही अवैध है। मामला केवल शासन को टैक्स का चूना लगाने तक ही सीमित नहीं है। बस की छतों पर क्विंटलों वजन के थैले चढ़ाए जा रहे हैं। जहां एक व्यक्ति को बैठना है, वहां चार के बैठने से बस आेवरलोड हो रही हैं। इन्हीं कारणों से आए दिन मजदूरी के लिए गुजरात आने-जाने वाले वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने के मामले सामने आते रहते हैं।
यह तो केवल एक बानगी है...ऐसी कई बसें चल रही जिला मुख्यालय से -रात के 11 बज रहे थे। मेघनगर नाके पर जीजे 20 वी 7908 नंबर की स्लीपर बस खड़ी थी। निचले और ऊपरी हिस्से की सीटें जो कि यात्री को सोने के लिए लगाई गई हैं, वहां एक-एक सीट पर चार-चार लाेग बैठे थे। ये सभी लोग मजदूरी के लिए गुजरात के लिमड़ी जा रहे थे। बस में सवार किराड़ सिंह ने बताया परिवार के सदस्य व रिश्तेदार समेत कुल 30 लोग लिमड़ी जा रहे हैं। अन्य लोग भी हैं, जिन्हें लिमड़ी जाना है। स्लीपर बस में जाने का कारण पूछने पर उन्होंने बताया यह बस हमें अंदर गांव तक छोड़ेगी, जहां हमें मजदूरी के लिए जाना है। दूसरी बसें उनके स्टाॅप पर ही छोड़ देती हैं।
मजदूरी के लिए गुजरात जाने वालों की खेप टूरिस्ट परमिट की बसों से छोड़ रहे
40 की जगह बैठा रहे 100 से ज्यादा
आसपास के दुकानदारों ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया यहां से ऐसे ही बसें भराती हैं, जो गुजरात के लिमड़ी, जामनगर आदि क्षेत्रों तक मजदूरों को ले जाती हैं। परिवहन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार टूरिस्ट परमिट की इन स्लीपर बसों में यात्री बसों के मुकाबले ढाई गुना कम टैक्स लिया जाता है। इन बसों में इस तरह यात्री ढोना अवैध है।
स्लीपर बस में भरी सवारियां व छत पर लगा सामान।