भास्कर संवाददाता | आलीराजपुर
संचार क्रांति के दौर में कला की कई विरासतें दम तोड़ रही हैं। ऐसे में कर्नाटक का स्वामी परिवार बहरूपिये का स्वांग रचाने की कला को बचाने के लिए अलग-अलग स्थानों पर घूम रहा है। पिता के साथ घूम रहे चार बेटे भी अलग-अलग तरह से उनका साथ देते हैं। स्वांग रचाने की इस कला के जरिए वे कुछ राशि भी एकत्र कर लेते हैं। लेकिन इसके बावजूद बेटों के साथ घूम रहे पिता का दर्द भी है कि इस कला को आने वाली पीढ़ी अपनाना नहीं चाहती।
आलीराजपुर पहुंचे यमयल्पा स्वामी ने बताया कि वे मूलत: कर्नाटक के रहने वाले हैं लेकिन 32 साल से इंदौर को अपनी कला साधना केंद्र बनाया हुआ है। वे बताते हैं कि वे अपने 4 बेटों के साथ विरासत में बंटे क्षेत्र में बहरूपिये का स्वांग रचते हैं। जिनमें बड़वानी, खरगोन, झाबुआ, धार और आलीराजपुर में रोजाना एक सप्ताह तक विभिन्न स्वांग रचते हैं। इस दौरान तबला, हारमोनियम आदि वाद्य यंत्र के साथ वे जब घरों के सामने गाते हैं तो उन्हें दक्षिणा के रुपए में कुछ राशि दी जाती है। यमयल्पा के साथ उनके बेटे है मारुति जो तबले पर संगत देते हैं और दूसरे बेटे है राजा जो सप्ताहभर में कृष्ण, हनुमान, शिव, रावण आदि का रूप धरते हैं।
केवट संप्रदाय के लोग करते हंै इस कला का प्रदर्शन
यमयल्पा स्वामी ने बताया कि बहरूपिये का स्वांग रचने की कला को करने वाले कलाकार केवट संप्रदाय से होते हैं जो खेमों में बंटे हुए हैं। वहीं तात्कालीन प्रदेश सरकार ने इस समाज के लिए इंदौर में नि:शुल्क भूखंड भी आवंटित किए थे। जहां अब 7-8 घर हो चुके हैं। अपनी कला में निपूर्णता और गायन-वादन के लिए यह लोग वर्ष में एक बार अपने गृह क्षेत्र कर्नाटक के डावनगी जिले में जरूर जाते हैं।
बचपन से इस कला से जुड़े तो अधिक पढ़े भी नहीं
यमयल्पा बताते हैं कि बचपन से ही इस कला से जुड़े है इसलिए पढ़ाई भी अधिक नहीं की। परिवार के साथ दिनभर घूमकर कला का प्रदर्शन करते हैं जिससे 300-400 रुपए मिल जाते हैं। अभी आलीराजपुर जिले के सभी शहरों और कस्बों में उक्त कला का प्रदर्शन करने जा रहे हैं।
ताकि विरासत बची रही
अपनी कला का प्रदर्शन करने शहरों व कस्बों में 4 बेटों के साथ जाते हैं, पर अफसोस है कि आने वाली पीढ़ी अपनाना नहीं चाहती इसे
नगर में रोजाना अलग-अलग रूप में लोगों का मनोरंजन करने बेटों के साथ पहुंच रहे यमयल्पा