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मेरठ नहीं, अंबाला से शुरू हुई थी अंग्रेजाें के खिलाफ बगावत

3 वर्ष पहले
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पंचनंद ग्रामीण अध्ययन केंद्र माजरा दूबलधन और भारतीय इतिहास संकलन समिति हरियाणा जिला झज्जर के संयुक्त तत्वावधान में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में झज्जर जिले के योगदान पर छोटूराम सभागार में संगोष्ठी की गई। इसमें स्कूली बच्चों की प्रश्नोत्तरी भी करई गई। इस स्पर्धा में सीआर स्कूल माजरा के विद्यार्थियों ने बाजी मारी।

संगोष्ठी में मुख्य वक्ता इतिहासविद रोहतक के अस्थल बोहर स्थित मस्तनाथ विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग अध्यक्ष डाॅ. मनमोहन शर्मा ने कहा कि 10 मई 1857 को मेरठ से नहीं सबसे पहले 8 मई 1857 को अंबाला छावनी से अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू हुई थी। हरियाणवी सैनिकों ने अंग्रेज सत्ता के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया था। डाॅ. शर्मा ने कहा कि झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान ने अंग्रेजों को सैन्य सहायता देने से इनकार कर दिया था। 23 मई 1857 को शाही राजसत्ता ने दिल्ली से तफाजल हुसैन को भेजा था पर तफाजल हुसैन को इस इलाके से निराश लौटना पड़ा। आखिरकार रोहतक के तत्कालीन डिप्टी कलक्टर आदम लोच ने मोर्चा संभाला। झज्जर की जनता ने आदम लोच के प्रशासनिक अधिकारियों को भी बेदखल कर दिया था। इसलिए आदम लोच को भी गोहाना के रास्ते भागना पड़ा। इसके अलावा ब्रिगेडियर शावर्स और कप्तान हडसन को यहां से खाली हाथ लौटना पड़ा। इस प्रकार नवाब की सेना ने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लिया। मांडोठी और बेरी के सरकारी कार्यालयों को आग के हवाले कर दिया। यहां छह महीने तक मार्शल लॉ की स्थिति रही। इस मौके पर छात्रों, प्रबुद्धजनों और इतिहासकारों ने हिस्सा लिया। संगोष्ठी में अशोक काद्यान, राजीव काद्यान, सुखबीर सिंह, सतवीर मास्टर, सतेंद्र पटवारी, बिजेंद्र धनखड़, अनिल शर्मा उपस्थित थे।

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