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250 गांवों में जल बचाने के लिए टोंटियां लगाने की योजना

3 वर्ष पहले
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जिले में पानी की वेस्टेज रोकने के लिए सभी चार उपमंडलों के लिए हर घर टूंटियां लगाने की योजना है। योजना को जिले में मौजूद 1200 स्वयंसेवकों से पूरा किए जाने का लक्ष्य है। स्थिति यह है कि जल बचाव की इस महत्वपूर्ण योजना को सीरे चढ़ाने के लिए जनस्वास्थ्य विभाग के पास न तो कोई आंकड़ा है और न ही कोई सर्वे रिपोर्ट है। इसके बावजूद इस तकनीकी कार्य को कराने के लिए साधारण काॅलेज छात्रों की मदद से पूरा कराने का कार्यक्रम ग्रवित के तहत तैयार किया है।

योजना को लेकर जिस प्रकार से खाका तैयार किया गया है। उस मामले में गांव दर गांव जलापूर्ति करने वाले जनस्वास्थ्य विभाग एवं मौजूदा योजना को सिरे चढ़ाने वाले ग्रवित प्रोजेक्ट आफिस अनिल दहिया की राय अलग है। हैरानी की बात यह है कि इस योजना को जिले के सभी चार उपमंडल पर शुरू करने की है, लेकिन दोनों ही एजेंसियों के पास जिले के ढाई गांव में कितनी टूटियां नहीं है। इस प्रकार का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। दूसरा पहलु इसके क्रियव्यन को लेकर है। इस प्रोजेक्ट में ग्रवित के तहत काम करने वाले स्वयं सेवकों को झोंकने की तैयार है, लेकिन एक्पर्टस मानते हैं कि इस काम को ट्रैंड प्रश्न ही कर पाएंगे। ऐसे में योजना के मौखिक प्रचार और जमीनी फायदों को लेकर खासी चर्चा बनी है।

टेक्निकल कार्य कराने के लिए वालंटियर रूपी काॅलेज छात्रों की मदद से करने की रणनीति

घरों में टोंटी लगाने वालों को किया जाएगा सम्मानित

मंत्री की घोषणा के मुताबिक गांव पानी को वेस्ट होने से बचाना है। इसके लिए जो पंचायतें अपने गांव के सभी घरों में टोंटी लगाएंगी, उनको सम्मानित भी किया जाएगा। इसी तर्ज पर ग्रवित के स्वयं सेवकों को सम्मानित किया जाएगा, जो इस योजना को क्रियावान करेंगे। इसके तहत प्रदेश के 30 उपमंडल चिंहित किए गए हैं। झज्जर में सभी चार उपमंडल शामिल है। टोंटी या इसके लिए धनराशि सरकार जुटाएंगी।

छात्र ही कर सकते हैं बेहतर काम

गुढ़ा आईटीआई के अधिकारी जीतपाल रोज का कहना है कि टोंटी लगाना या फिर लोहे या प्लास्टिक पाइप पर चूडिय़ा निकलने का कार्य बेहतर रूप से एक प्लंबर का अनुभव रखने वाला छात्र ही कर सकता है। जिले की 13 आईटीआईयों में 8 में प्लंबर की ट्रेड हैं। इनमें करीब 250 छात्र है। स्वयंसेवाओं की बजाए यदि इन छात्रों की मदद ली जाती है, तब कहीं अधिक बेहतर तरीके से काम कराया जा सकता है। प्लंबर के काम में उपकरण के साथ इनके इस्तेमाल करने का हुनर भी होना बेहद आवश्यक रहता है। जो एक साधारण व्यक्ति के पास नहीं होता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में 95 फीसदी से अधिक घरों में टोंटी नहीं

अधिकारियों की माने तो ग्रामीण क्षेत्रों में 95 फीसदी से अधिक लोगों के घरों में टोंटी नहीं है। वर्ष भर में 12 लाख रुपए से अधिक की राशि केवल जल बचाव के नाम पर जागरूकता करने पर खर्च की जा रही है। विभाग लंबे समय से इस प्रकार की जागरूकता के दावे कर रहा है। लेकिन बावजूद इसके ग्रामीण क्षेत्र में लोग की मानसिकता टोंटी के प्रयोग की क्या नहीं बन सकी है। इसके बारे में विभाग के पास कोई जवाब नहीं है। एक अधिकारी का तर्क है ये लोगों की मानसिकता पर निर्भर है। जागरूकता कार्यक्रम तो कुछ ऐसा ही है जैसे एक टीचर लैक्चर देकर चला चला जाता है।

जिले में ढाई सौ के करीब गांव है, लेकिन कितने घरों में टोंटी नहीं है। इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है। मोटे तौर पर आबादी का साढ़े पांच फीसदी पानी के कनेक्शन माने जाते हैं। व्यवहारिक रूप से ग्रामीण टोंटी लगाने के आदि नहीं है। यदि लगाई भी जाती है, तब ये फिजिबल नहीं हो पाती है। ऐसे में यदि उनको फ्री में भी उपलब्ध कराए जाएगा। -आरपी वश्ष्ठि, कार्यकारी अभियंता जनस्वास्थ्य विभाग झज्जर।

बगैर टोंटी वाले घरों का सही सरकारी आंकड़ा लिए, आगे का लक्ष्य तह नहीं किया जा सकता है। लेकिन फिर भी जिले में पानी की कमी को देखते हुए प्रयास अच्छा है। पहले जागरूकता में कुछ कमी रही हो, लेकिन वे फिर से नई उर्जा के साथ इस अभियान का हिस्सा बनने जा रहा है। -प्रकाश धनखड़, समाजसेवी झज्जर।

गांव में नहीं है टोंटी कल्चर

जनस्वास्थ्य विभाग का कहना है कि उनका गांव में जलापूर्ति के वितरण सिस्टम में कोई कंट्रोल नहीं है। यानि विभाग पानी की लाइन और इसका कनेक्शन तो कर सकता है, लेकिन उपभोक्ता को टोंटी लगाने के लिए बाध्य नहीं कर पाता। विभाग का कहना है कि राजनीतिक इच्छा शक्ति न होने इसके पीछे बड़ा कारण है। दूसरा इनका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ताओं को भैंस नहलाने व दूसरे कार्यों के लिए सीधे पौना इंची रबड़ का पाइप लगाना होता है। इसके चलते ये टोंटी लगाने से बचते हैं और यदि लगाई तो वे उखाड़ फेकेंगे।

टोंटी को लेकर ग्रामीण की अवधारण का मामला उनके सामने आया है। अब हमारा टोंटी से अभिप्राय पानी रोकना है। टोंटी की जगह पर वॉल लगाई जाएगी, जिसके आगे एक निपल भी होगी। इसमें रबड़ का पाइप भी चढ़ सकता है। यह काम अभी तक जिले के 12 सौ स्वयं सेवकों के माध्यम से करने का लक्ष्य है। इसके लिए इनको मौखिक ट्रेनिंग भी दी है। -अनिल दहिया, प्रोजेक्ट अधिकारी ग्रवित झज्जर।

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