झज्जर के ग्वालीसन रोड स्थित कांकरवाला पीर की दरगाह धार्मिक सद्भाव की प्रतीक बनी है। यहां मुस्लिम फकीर की समाधी पर पहले चादर चढा़ई जाती है फिर दरगाह परिसर में ही मौजूद अन्य देवी-देवताओं की सुबह-शाम आरती होती है। प्रसाद बांटा जाता है। अहम यह है कि दरगाह का सज्जादानशीन और मंदिर के पुजारी का जिम्मा एक ही शख्स संभालता है। इस तरह झज्जर की यह दरगाह सामाजिक भाईचारे का संदेश दे रही है। क्षेत्र के तलाव गांव के पास नहर के किनारे यह दरगाह आजादी से पहले की बनी हुई है। पहले इसकी देखरेख मुस्लिम करते थे, लेकिन आजादी के बाद जब बंटवारा हुआ तो मुस्लिम पाकिस्तान चले गए। इसके बाद हिंदू परिवारों ने मुस्लिमों की इस विरासत को सांप्रदायिक सद्भाव के नजरिए से संभाला।
मुस्लिम फकीर की समाधी पर पहले चादर चढा़ई जाती, फिर दरगाह परिसर में सुबह-शाम की होती आरती
झज्जर. कांकर वाले परा दरगाह की जमीन पर बने मंिदर व दरगाह पर चादर चढ़ाते जय िसंह में पूजा पाठ करता जय िसंह।
35 साल सेे जयसिंह दरगाह
और मंदिर कर रहे देखरेख
झज्जर निवासी जयसिंह गुर्जर 35 साल से कांकरवाला पीर की दरगाह की देखरेख कर रहे हैं। इसके बाद वह यहां अन्य मंदिरों में जाकर देवी-देवताओं को नहलाकर उनका श्रृंगार करने के बाद आरती करते हैं। जयसिंह ने बताया कि उसे बताया गया कि देश के अन्य स्थानों पर जो दरगाहें हैं वहां का काम ज्यादातर मुस्लिम ही देखते हैं, लेकिन वो जाति व धर्म को विश्वास करने की बजाए लोगों की धार्मिक भावनाओं को मानते हैं। मंदिर तो यहां बाद में बने हैं, पहले दरगाह है। ऐसे में दरगाह का सालाना उत्सव विशाल तौर पर मनाया जाता है। दरगाह के साथ मेें एक घोड़े की प्रतिमा भी है। समझा जाता था कि यह पीर का घोड़ा है।