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शहर में गूंज रहे हैं बोल बम के जयकारे हरिद्वार से कांवड़ लेकर पहुंचे शिव भक्त

3 वर्ष पहले
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मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए हरिद्वार से कांवड़ लाने वाले श्रद्धालु अब अपने शहरों की ओर लौटने लगे हैं। सड़कों पर बोल बम के जयकारे गूंजने लगे हैं। भोले के भक्तों की सेवा के लिए जगह-जगह शिविर लगे हुए हैं। मंदिरों में उमड़ने वाली भीड़ व महिलाओं की भारी संख्या को ध्यान में रखते हुए महिला पुलिसकर्मी भी तैनात किए जाएं। इस बार जिले से लगभग 4500 भक्त कांवड़ ला रहे हैं। इन कांवड़ियों में इस बार महिला श्रद्धालुओं की संख्या भी अच्छी-खासी है। सावन में भगवान महादेव की और भक्तों के बीच की दूरी कम हो जाती है। इसलिए भगवान को प्रसन्न कर मनोवांछित फल पाने के लिए कई उपायों में एक उपाय कांवड़ यात्रा भी है, इसे शिव को प्रसन्न करने का सहज मार्ग माना गया है।

महाभारतकालीन जयंती देवी मंदिर के पुजारी नवीन कुमार शास्त्री ने बताया कि पंचांग और शिव महापुराण के मुताबिक श्रवण मास की शिवरात्रि 9 अगस्त को आद्रा नक्षत्र प्रात:काल से प्रारंभ होकर रात्रिकाल नक्षत्र तक रहेगी। इसलिए श्रद्धालु 9 अगस्त की रात्रि में ही भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों पर गंगाजल चढ़ाएं। उन्होंने कहा कि 8 अगस्त को सुबह से रात तक जल चढ़ाना पंचांग के अनुसार ठीक नहीं है। श्रावण मास की शिवरात्रि विशेष फलदायी होती है। शिवरात्रि का व्रत सब व्रतों से उत्तम और कल्याणकारी होता है। जिस तरह गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है, उसी तरह से भगवान शिव समान कोई दूसरा देवता नहीं है। भगवान शिव मात्र जलाभिषेक से प्रसन्न होकर भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। इसलिए शिवरात्रि को भगवान शिव की चारों प्रहर पूजा करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि दूध, दही, घी, शहद, खांड, चंदन का लेप करने के बाद भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करते हुए ओम नम: शिवाय तथा महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। किसी पावन तीर्थ जैसे हरिद्वार से कंधे पर गंगाजल लेकर आने और अपने घर के नजदीक भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों पर चढ़ाने की परंपरा कांवड़ यात्रा कहलाती है।

कैसे शुरू हुई कांवड़ यात्रा : पंडित नवीन शास्त्री ने बताया कि पहला कांवड़िया रावण था। भगवान राम ने भी भगवान शिव को कांवड़ चढ़ाई थी। आनंद रामायण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान राम ने कांवड़िया बनकर सुल्तानगंज से जल लिया और देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था।

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