पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Local
  • Rajasthan
  • Jodhpur
  • घोटाले में गहन जांच की जरूरत मानते हुए ठुकराई मीणा की अग्रिम जमानत याचिका

घोटाले में गहन जांच की जरूरत मानते हुए ठुकराई मीणा की अग्रिम जमानत याचिका

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
पहला तर्क: कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के दो तर्क हैं। पहला तर्क 22 फरवरी 2016 के पत्र द्वारा 35016 क्विंटल गेहूं की मांग किया जाना, जो अगस्त 2015 में तत्कालीन डीएसओ राजपुरोहित ने सरेंडर कर दिया था।

यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इसमें याचिकाकर्ता शामिल नहीं है: हाईकोर्ट

लीगल रिपोर्टर | जोधपुर

राजस्थान हाईकोर्ट ने 35 हजार क्विंटल गेहूं के गबन के मामले में निलंबित आईएएस अफसर निर्मला मीणा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विश्नोई ने कहा, वे जांच एजेंसी के इस तर्क से सहमत हैं, कि इस घोटाले की गहन जांच की जरूरत है, कई और उच्चाधिकारी शामिल हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस स्तर पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है, कि इस अपराध में याचिकाकर्ता शामिल नहीं है। याचिकाकर्ता से कस्टोडियल इंट्रोगेशन नहीं होने पर लगाए गए आरोप की जांच में रुकावट या बाधा उत्पन्न हो सकती है।

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क देते हुए कोर्ट को बताया कि गेहूं गबन का लगाया गया आरोप झूठा है। आवंटित गेहूं अगर जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचा है तो इसके लिए जिला रसद अधिकारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। याचिकाकर्ता ने जनहित को देखते हुए पुन: गेहूं आवंटन करवाया था, लेकिन उस पर 35 हजार क्विंटल गेहूं गबन का आरोप झूठा है।

एएजी राजेश पंवार व अधिवक्ता सुनील जोशी ने तर्क देते हुए कहा, कि याचिकाकर्ता मुख्य आरोपी है। लाभान्वित परिवारों की संख्या में कभी बढ़ोतरी नहीं हुई। राज्य सरकार के निर्देश थे कि सितंबर 2015 से लाभान्वित परिवारों को नए राशनकार्ड के आधार पर ही गेहूं वितरित किया जाना है। जब 35016 क्विंटल गेहूं पहले ही वितरित किया जा चुका तो पुन: आवंटन के लिए क्यों पत्र लिखा गया और गेहूं क्यों प्राप्त किए? 33 हजार नए परिवार जोड़े ही नहीं गए।

हाईकोर्ट ने इन तथ्यों के आधार पर नहीं दी अग्रिम जमानत

दो तर्क एक साथ नहीं चल सकते

कोर्ट ने कहा कि अगर 33 हजार लाभान्वित परिवार 63 हजार में पहले से शामिल थे तो फिर अगस्त 2015 में सरेंडर किए गए 35016 क्विंटल गेहूं की डिमांड कैसे की गई? दूसरी ओर अगर याचिकाकर्ता ने अगस्त 2015 में 35016 क्विंटल सरेंडर किए गए गेहूं को पुन: आवंटन के लिए लिखा तब तो अतिरिक्त लाभान्वित परिवारों का जुड़ना बताकर 22 फरवरी 2016 को पत्र लिखने का सवाल ही नहीं उठता।

कोर्ट ने कहा, कि दो तर्क साथ नहीं चल सकते, दोनों में एक अस्वीकार्य है।

यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इसमें याचिकाकर्ता शामिल नहीं है: हाईकोर्ट

लीगल रिपोर्टर | जोधपुर

राजस्थान हाईकोर्ट ने 35 हजार क्विंटल गेहूं के गबन के मामले में निलंबित आईएएस अफसर निर्मला मीणा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विश्नोई ने कहा, वे जांच एजेंसी के इस तर्क से सहमत हैं, कि इस घोटाले की गहन जांच की जरूरत है, कई और उच्चाधिकारी शामिल हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस स्तर पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है, कि इस अपराध में याचिकाकर्ता शामिल नहीं है। याचिकाकर्ता से कस्टोडियल इंट्रोगेशन नहीं होने पर लगाए गए आरोप की जांच में रुकावट या बाधा उत्पन्न हो सकती है।

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क देते हुए कोर्ट को बताया कि गेहूं गबन का लगाया गया आरोप झूठा है। आवंटित गेहूं अगर जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचा है तो इसके लिए जिला रसद अधिकारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। याचिकाकर्ता ने जनहित को देखते हुए पुन: गेहूं आवंटन करवाया था, लेकिन उस पर 35 हजार क्विंटल गेहूं गबन का आरोप झूठा है।

एएजी राजेश पंवार व अधिवक्ता सुनील जोशी ने तर्क देते हुए कहा, कि याचिकाकर्ता मुख्य आरोपी है। लाभान्वित परिवारों की संख्या में कभी बढ़ोतरी नहीं हुई। राज्य सरकार के निर्देश थे कि सितंबर 2015 से लाभान्वित परिवारों को नए राशनकार्ड के आधार पर ही गेहूं वितरित किया जाना है। जब 35016 क्विंटल गेहूं पहले ही वितरित किया जा चुका तो पुन: आवंटन के लिए क्यों पत्र लिखा गया और गेहूं क्यों प्राप्त किए? 33 हजार नए परिवार जोड़े ही नहीं गए।

दूसरा तर्क: जोधपुर शहरी क्षेत्र में 33 हजार लाभान्वित परिवार बढ़ गए और इसलिए 35016 क्विंटल गेहूं की मांग की गई।

बिना सत्यापन आवंटन में जांच की जरुरत

तत्कालीन डीएसओ राजपुरोहित ने सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दिए गए बयानों में बताया, कि उसने अगस्त 2015 में गेहूं सरेंडर कर दिए थे और सितंबर 2015 में फिर से आवंटित करा दिए।

कोर्ट ने कहा, याचिकाकर्ता ने बताया, कि जोधपुर शहरी क्षेत्र में 33 हजार लाभान्वित परिवार बढ़ने पर 35016 क्विंटल गेहूं अतिरिक्त आवंटित करवाए। फिर 3 मार्च 2016 को उसने 10 हजार क्विंटल गेहूं ग्रामीण क्षेत्र के लिए आवंटित कर दिए। इसमें लूणी, मंडोर व बावड़ी पंचायत समिति के क्षेत्र शामिल हैं। जब लाभान्वित परिवारों की संख्या शहरी क्षेत्र में बढ़ी है तो फिर उसे ग्रामीण क्षेत्र में क्यों आवंटित कर दिया गया?

कोर्ट ने यह भी कहा, कि अतिरिक्त खाद्य आयुक्त ने एक सामान्य पत्र पर बिना सत्यापन किए 33 हजार लाभान्वित परिवार बढ़े भी या नहीं, 35016 क्विंटल गेहूं आवंटित कर दिया। इस तथ्य पर भी जांच की जरूरत है।

खबरें और भी हैं...