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विश्व धरोहर दिवस आज : इनका वैभव भी कम नहीं, बस सहेजने की जरूरत

3 वर्ष पहले
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सन् 1615 में सवाई राजा सूरसिंह ने अपनी रानी सौभाग्य कंवर के लिए इसका निर्माण शुरू कराया था। 1631 में गजसिंह प्रथम ने इसका निर्माण पूरा करवाया। कालांतर में सुरक्षा की दृष्टि से राजमाताएं और शासकों की विधवा रानियां इसमें रहने लगीं। महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय के राज परिवार व शाही खजाने के साथ यहां काफी समय तक निवास किया। रानियों को मेहरानगढ़ के महल तक जाने के लिए रानीसर तालाब से तलहटी के महल तक बनीं सुरंग के रास्ते लाया जाता था। 24 नवंबर 1896 में महल के नीचे फीमेल अस्पताल का निर्माण करवाया गया। वहीं 1912 में अंग्रेज अधिकारी ह्यूसन के नाम पर स्कूल खोला गया।

खास क्या | महाराजा तखतसिंह ने महलों में दो अलग-अलग हिस्से करके अंत्र का कोठार और खेमा का कारखाना बनाया था। धरातल से 65 फीट ऊंचा बना महल बारीक स्थापत्य व वास्तुशिल्प का नायाब उदाहरण है। महलों के जाली-झरोखों पर नक्काशी व पच्चीकारी का सुंदर कार्य किया हुआ है।

रातोंरात बनी थी त्रिपोलिया की पोळ

महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय ने ईस्वी सन् 1873 से 1895 के ताजीमी मुत्सद्दी फौज बक्षी व स्टेट काउंसिल के सदस्य सिंघवी बच्छराज भींवराजोत ने कंदोइयों के चौराहे से पोकरण हवेली के बीच सोजती गेट की तरफ स्थित अपनी हवेलियों के बीच ईस्वी सन 1894 में रातों रात त्रिपोलिया पोळ का निर्माण करवाया था। इसका निर्माण करने वाले सिलावट गजधर को सोने की चेन व हाथ के लिए माठियां पुरस्कार के रूप में दी थी।

शहर कोतवाली भवन

नवचौकिया स्थित शहर कोतवाली भवन का निर्माण सन् 1751 में महाराजा बखतसिंह ने करवाया था। इसके बाद महाराजा तखतसिंह ने कोतवाली के ऊपर महलों का निर्माण करवाया वहीं कैदियों के लिए भाखसी यानी कैदखाना बनवाया था। जिसे बाद में सोजतीगेट स्थानांतरित कर दिया गया,जो अभी सेंट्रल जेल है।

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