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नाले का टेंडर फिर रद्द बारिश आफत बनेगी

3 वर्ष पहले
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मानसून अगले माह के अंत में आने की संभावना है। पूरे शहर के बारिश का पानी ढोने वाला नेहरू पार्क बरसाती नाले का काम 1 साल में भी पूरा नहींं हुआ है। नेहरू पार्क बरसाती नाले को जेएनवीयू गेट से जोजरी तक जोड़ने के काम की ई-टेंडर प्रक्रिया तीसरी बार भी निरस्त हो गई है। यानी पूरी आशंका है कि नगर-निगम की लापरवाही और लेटलतीफी का भुगतान हमें ही करना होगा। इस बार भी शहर की सड़कों पर पानी भरेगा, कई मोहल्लों व घरों में घुसेगा। गत वर्ष एक प्रोफेसर और मां-बेटा इन नालों की लापरवाही से जान गंवा चुके हैं। हाईकोर्ट ने यह काम करने के लिए फरवरी 2018 की डेडलाइन दी थी। इस अवधि तक काम नहीं शुरू हुआ तो फटकारा भी। इसके बाद निगम ने मानसून से पहले काम पूरा करवाने का आश्वासन दिया था, लेकिन टेंडर प्रक्रिया से बाहर ही नहीं निकल पा रहा है। सिविल विंग का कहना है कि दर ज्यादा होने से टेंडर में शामिल सिंगल ठेका फर्म को कार्यादेश जारी नही किया।

उम्मीद है कि एक-डेढ़ माह में वर्कऑर्डर जारी होगा। कार्य के लिए नगर निगम की ई-टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाली सिंगल ठेका फर्म लक्ष्मी कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा दर कम करने से इनकार करने के बाद ई-टेंडर प्रक्रिया को निरस्त किया है। हालांकि निगम शॉर्ट टर्म टेंडर प्रक्रिया में लगा है। इसके लिए शॉर्ट टर्म टेंडर निकाल भी देता है तो इस प्रक्रिया पूरी करने में ही डेढ़ माह लगेंगे। ऐसे में इस मानसून से पहले नाला जोजरी नदी से नहीं जुड़ सकेगा। वहीं मेयर घनश्याम ओझा ने बताया कि नालों की सफाई करवा रहे हैं। उम्मीद है कि इन नालों की सफाई से बारिश में जलभराव नहीं होगा।

अभी 4.5 किमी बना नाला 7.5 किमी और बनाना है

न्यू कैंपस से 2.4 किमी कवर नाला निकलेगा। अभी 4.5 किमी नाला बना है, लेकिन 7.5 किमी बनाना है। न्यू कैंपस परिसर से बरसाती नाला निकालने के लिए जेएनवीयू की 2400 मीटर जमीन निगम लेगा। इस पर करीब 40 करोड़ की लागत का अनुमान है।

न्यू कैंपस से गुजरने वाले नाला कवर करेगा, लेकिन कुछ जगह सफाई के लिए मेनहोल या खुला भी रखेगा। इसके अलावा इस रास्ते में आने वाले पेड़ कटेंगे, लेकिन मास्टर प्लान का उल्लंघन न हो, निगम इसी परिसर में दुगुने पौधे भी लगाएगा।

15 करोड़ की जरूरत मिले 18 करोड़

फिर भी काम अधूरा

29 सितंबर को जारी टेक्निकल बिड में न्यूनतम दर देने वाली ठेका फर्म के शर्तों पर खरी नहीं उतरने के बाद 16 नवंबर को ई-टेंडर प्रक्रिया को निरस्त किया।

28 फरवरी को टेक्निकल बिड खोलनी थी, लेकिन इच्छुक ठेका फर्मों के उत्साह नहीं दिखाने से इस तिथि को आगे बढ़ाना पड़ गया था।

नेहरू पार्क से होकर सरदार क्लब के पीछे तक (सेना की दीवार) यह नाला पक्का बना हुआ है। जेएनवीयू कैंपस से जोजरी तक जोड़ने के लिए निगम को पहले चरण में नाले के निर्माण पर 14 करोड़ 85 लाख रुपए खर्च करने थे।

18 करोड़ अटल मिशन फॉर रेजुवेनशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत मिशन) के तहत निगम को मिल चुकी है। इसके बावजूद यह काम मंथर गति से चला।

अब नाले की सफाई की खानापूर्ति कर रहे

निगम की सफाई विंग नाले की सफाई में जुटी है। खतरनाक पुलिया से होकर देवनारायण मंदिर होते हुए सरदार क्लब की दीवार तक के नाले की पोकलेन मशीन से सफाई हो रही है। मुख्य सफाई निरीक्षक कमल पंडित ने बताया, कि मानसून से पहले तक नाले को पूरा साफ कर देंगे।

गुलाब सागर बच्चे का गार्डन सा नजारा

जलकुंभी जो प्रदूषण फैला जलचर मारेगी, मच्छर बढ़ाएगी

जोधपुर| आंखों को सुहाने वाले हरे-भरे गार्डन जैसा दृश्य असल में गुलाब सागर बच्चे का है। नगर-निगम द्वारा सफाई न करवाने से अनगिनत जलकुंभी उग आई और पानी अदृश्य हो गया है। ये सुंदर नजारा असल में बेहद खतरनाक है। महाराजा गंगासिंह यूनिवर्सिटी में साइंस के डीन प्रो. अनिल छंगाणी बताते हैं कि- जलकुंभी जलाशय को पूरा ढंककर गैस एक्सचेंज बंद करती है। यानी अंदर की कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर नहीं आती, बाहर की ऑक्सीजन अंदर नहीं जाती। नतीजा- मछलियों सहित जलचर के लिए जानलेवा सिद्ध होता है। मच्छरों एवं अन्य कीट-पतंगों के लिए अनुकूल वातावरण बनाती है। आस-पास रहवासियों में डेंगू व मलेरिया का खतरा बढ़ जाता है।

शहर के दो जलाशयों को लील चुकी

यह धीरे-धीरे वाटर बॉडी को ही खत्म कर देती है। जड़ों से ये खूब पानी पीती है, और धूप पड़ते ही वाष्पीकृत करती है। वाष्पीकरण बढ़ने से जलाशय सूखने लगता है। जलकुंभी के कारण गंगलाव और गुरों का तालाब पहले ही खत्म हो चुके हैं। जलकुंभी के कारण तालाब सूखे तो लोगों ने खुलकर अतिक्रमण कर लिया।

बाहरी वनस्पति है, समूल नष्ट करना उपाय: पिस्तिया स्ट्रेटिओटिस फैमिली की यह वनस्पति लोकल नहीं है। इसे वाटर कैबेज कहते हैं। यहां ये बहकर आई है अथवा डाला गया है। एक बार जलाशय में आने के बाद समूल नष्ट करना ही एकमात्र उपाय है फोटो: शिव वर्मा

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