घरेलू हिंसा से जुड़े जोधपुर के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निर्णय को सही माना है कि घरेलू हिंसा का एक्ट लागू होने से पहले भी अगर किसी तरह की घरेलू हिंसा कारित की गई है तो वह इस एक्ट के दायरे में आएगी। साथ ही तीन जजों की बेंच ने स्पष्ट करते हुए यह भी निर्धारित किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत प|ी अपने पति के खिलाफ तलाक के बाद भी घरेलू हिंसा का केस दायर कर सकती है।
वर्ष 2007 में एक महिला ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने पति के विरुद्ध प्रार्थना पत्र पेश किया। कोर्ट ने इस आधार पर उस प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया कि घरेलू हिंसा का यह आरोप एक्ट लागू होने से पहले का है। सेशन कोर्ट ने भी निचली अदालत के ऑब्जर्वेशन की पुष्टि करते हुए प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया।
महिला ने निचली अदालत के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने इस बिंदु को तय करने के लिए इस याचिका को खंडपीठ को रेफर किया।
दो परस्पर विरोधी फैसले
खुशी मोहम्मद मामले में यह निर्धारित किया गया था अगर प|ी को बेपरवाही या उदासीनता से तलाक दिया गया है तो यह घरेलू हिंसा के दायरे में आएगा, जबकि हेमा केस के मामले में यह निर्धारित किया गया कि अगर घरेलू हिंसा का एक्ट लागू होने से पहले विवाह विच्छेद हो गया है तो यह एप्लीकेबल नहीं होगा।
भूतलक्षी रूप से लागू होगा
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिका को स्वीकार करते हुए निर्णय दिया कि घरेलू हिंसा का एक्ट भूतलक्षी रूप से लागू होगा, जहां खासतौर से पति द्वारा अपनी प|ी को इस एक्ट के लागू होने से पहले तलाक दिया गया हो।
पति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी
हाईकोर्ट के इस फैसले को पति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और कहा, कि घरेलू हिंसा अधिनियम एक क्रिमिनल लॉ है, इसलिए यह भूतलक्षी रूप से लागू नहीं हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पति को नहीं दी राहत
अगर व्यथित व्यक्ति किसी भी समय एक्ट लागू होने से पहले डोमेस्टिक रिलेशनशिप में रहा हो और घरेलू हिंसा का विषय हो तो वह इस एक्ट के तहत उपचारात्मक उपाय लेने का हकदार है। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने कहा, कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करने को तैयार नहीं है। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी को खारिज कर दिया।