जोधपुर| शरीर में काम के लिए मन का प्रयोग होता है और बाहरी काम के लिए चेतना का प्रयोग। शरीर के सर्वांगीण विकास के लिए मन को चेतना के साथ जोड़कर चलना चाहिए। कुछ ऐसे ही सूत्र आचार्य परम आलय ने मन के बारे में बताते हुए व्यक्त किए। दैनिक भास्कर की मीडिया पार्टनरशिप में रेलवे स्टेडियम ग्राउंड में चल रहे सन टू ह्यूमन मेडिटेशन कैंप के चौथे दिन परम आलय ने मन और शरीर के अंतर संबंधों के बारे में बताया। परम आलय ने बताया कि मन के चार केंद्र होते हैं। पहला केंद्र काम होता है। इसको विकसित करने से ब्रह्मचर्य उत्पन्न होता है। दूसरा केंद्र क्रोध होता है, इसको रूपांतरित करके करूणा विकसित की जा सकती है। तीसरा केंद्र लोभ होता है, इसको विकसित करके लाभ में बदला जा सकता है। चौथा केंद्र मोह होता है, यह भय के कारण होता है। संसार में भोगी किसी काम के नहीं होते हैं। परम आलय ने कहा कि जीवन का प्रतिफल सृजन होना चाहिए। जीवन को समझना चाहिए, उसे समझने से ही जीवन सफल होता है।
रेलवे स्टेडियम ग्राउंड में मेडिटेशन कैंप के चौथे दिन साधकों को कराए मन से जुड़े प्रयोग
परम आलय ने कैंप में बताया कि शरीर शुद्धि के लिए आहार सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, इसलिए जिसका अन्नमय कोष ठीक रहेगा, वही आगे मन को शुद्ध कर सकेगा। उन्होंने बताया कि इसके लिये सुबह क्षारीय तत्व वाला आहार, दोपहर में अम्लीयता व शाम के समय जल लेना चाहिए। इसके साथ ही निराहार और उपवास को अपनाकर पूरे शरीर को शुद्ध किया जा सकता है। अभी कैंप में इसी तरह का फूड दिया जा रहा है और इस फूड की ऊर्जा को रूपांतरित करने के लिए प्रतिभागियों को नाभि झटका प्रयोग करवाया जा रहा है।
स्वस्थ मन के लिए अन्नमय कोष का ठीक होना जरूरी