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विषमता चाहे बाह्य हो या आंतरिक व्यक्ति खुद ही इसके लिए जिम्मेदार : डॉ. पदमचंद्र

3 वर्ष पहले
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जोधपुर| जैन संत डॉ. पदमचंद्र महाराज ने कहा, कि विषमता चाहे बाह्य हो या आंतरिक, इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति खुद ही होता है। जीवन में हर कदम पर विषमता मुंह खोलकर खड़ी है। आंतरिक चिंतन और सजगता से व्यक्ति इस परेशानी से बच सकता है। वे शुक्रवार को सरदारपुरा स्थित कोठारी भवन में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, कि बाह्य विषमता से व्यक्ति आसानी से छुटकारा प्राप्त कर सकता है, लेकिन आंतरिक विषमता से निकलने के लिए द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से, भाव से और मन-वचन से शुद्ध होना जरूरी है।

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मन रूपी घर को स्वच्छ करने के लिए विचारों का कचरा हटाना जरूरी
उन्होंने कहा, कि जिस तरह घर को स्वच्छ रखने के लिए कचरा हटाना जरूरी है। उसी तरह मन रूपी घर से विचारों रूपी कचरे को हटाकर ही सफाई की जा सकती है। ऐसा करने से ही मन पवित्र हो सकता है। सारी परेशानियां मानसिक है, इसे विचारों को शुद्ध करके ही दूर किया जा सकता है। विचारों की शुद्धता के लिए सामायिक की भूमिका महत्वपूर्ण है। जिस तरह वज्र के प्रहार से पर्वत चकनाचूर हो जाता है, उसी तरह मन को शुद्ध कर सभी बाधाओं को दूर किया जा सकता है।

कोई भी काम हो इसे मन से पूरा करें, सफलता अवश्य मिलेगी : संबुद्ध सागर
मुनि संबुद्ध सागर ने दिगंबर जैन मंदिर में साधकों को संबोधित करते हुए कहा, कि कोई भी काम हो। कितना ही मुश्किल हो। इसे मन से पूरा किया जाए तो सफलता अवश्य मिलेगी। उन्होंने कहा, कि काम अगर आप मन से न करो और सफल भी हो जाओ, मगर उतना आनंद नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा, कि महिला जब मन से काम करती है तो भोजन में अद‌्भुत स्वाद पैदा होता है। मेरी पेंटिंग बिकेगी या नहीं, मुझे लोगों की प्रशंसा मिलेगी या नहीं, इन बातों की परवाह और चिंता किए बना जब कोई कलाकार डूब जाता है, खो जाता है तो उसकी पेंटिंग विश्व प्रसिद्ध हो जाती है। इस अवसर पर मुनि क्षमा सागर भी मौजूद थे।

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