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कापरेन में तालाब किनारे लगता था हर साल पशु मेला अब वहां बनेगा पर्यटनस्थल, सरकार ने दिया बजट

3 वर्ष पहले
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कस्बे में तालाब की पाल पर प्रतिवर्ष 2 माह लगने वाला हाड़ौती प्रसिद्ध पशु मेला अब केवल एक याद बन गया है। बैलों के गले में बंधे घुंघरू की आवाज अब यहां लुप्त हो चुकी है।

प्रतिवर्ष नगर पालिका प्रशासन द्वारा मई-जून माह में पशु मेला लगाया जाता था। इसमें बड़ी तादाद में पूरी हाड़ौती समेत राज्यभर से किसान पशुओं की खरीद-फरोख्त करने यहां आते थे। ऐसे में तालाब पाल के किनारे का माहौल पशु शृंगार की दुकानों व दाल-बाटी के भोजनालयों से खुशनुमा बन जाता था। पशु मेले से पालिका प्रशासन को टैक्स के जरिए कमाई होती थी। बाहरी किसानों के आने से कस्बे के दुकानदारों की भी आमदनी बढ़ती थी। मेले में किसानों के लिए छाया, पानी, बिजली की व्यवस्था पालिका प्रशासन द्वारा दिलवाई जाती थी। नगर पालिका प्रशासन ने कुछ वर्षों से इस मेले का आयोजन बंद कर दिया है।

नगर पालिका मई-जून में लगवाती थी पशु मेला, टैक्स के जरिए कमाई भी होती, दो माह तक रहती थी रौनक

कापरेन। यहां लगने वाले पशु मेले में बड़ी संख्या में जानवर बिकने आते थे। (फाइल फोटो)

तालाब की हुई कायापलट

जिस तालाब के सहारे पशु मेला लगता था, अब उस तालाब का सरकार द्वारा प्राप्त बड़े बजट से सौंदर्यीकरण का कार्य करवाया जा रहा है। यह स्थान पर्यटनस्थल के रूप में विकसित हो सकता है। पहले मेले के दौरान आने वाले पशु इसी तालाब से अपनी प्यास बुझाया करते थे।

मेरे कार्यकाल में पशु मेले का आयोजन रहा। अब क्यों नहीं मेला भरता, मुझे पता नहीं है। प्रशासन को फिर से प्रयास कर पशु मेले को सुचारू संचालित करवाना चाहिए। -नंदकिशोर मेघवाल, पूर्व चेयरमैन, नगर पालिका कापरेन

पशु मेले नहीं भरने का कारण यही है कि किसानों ने पशु की खरीद-फरोख्त कम कर दी है। अब आधुनिक कृषि यंत्रों द्वारा खेती होने लगी। जिससे पशुओं का उपयोग कम हो गया है। -मुकेशकुमार मीना, चेयरमैन, नगर पालिका कापरेन

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