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रोजेदारों ने रोजे की नमाज अदा की

3 वर्ष पहले
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रमजान का मुबारक माह शुरू हो गया है। वहीं रोजेदारों ने रमजान माह के पहले शुक्रवार को रोजे की नमाज अदा की। हर मोमीन बंदा सारी व्यस्तता को दरकिनार करते हुए रोजा रखकर खुदा की इबादत में मशगूल है। जिससे रमजान माह में मस्जिदों में रौनक बनी हुई है। बड़े बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक इस पाक महीने की रस्मों को बड़ी शिद्दत से अदा कर रहे हैं। कुरान के अनुसार रमजान के मुबारक के महीने में रोजे रखकर सारे काम खास वक्त पर करने से इंसान एक सांचे में ढल जाता है। हर अमल नेक नियति से होता है। रोजेदार के हर अमल से अमन की फिजा निकलती है। इसलिए इस माह के प्रारंभ होने के साथ ही अलसुबह सहरी करने से लेकर दिन में पांच वक्त की नमाज और इबादत करने का दौर चल रहा है।

खुशियां लाती है ईद

बजीरपुर गेट मस्जिद के मुफ्ती मुहम्मद इल्यास मजाहिरी ने बताया कि रमजान महीने का आखिरी हिस्सा जैसे ही शुरू होता है तो मुस्लिम भाई नए - नए कपड़ों की खरीदारी के लिए बाजारों में निकलते हैं। अपने घरों की खास सजावट करते हैं। तरह - तरह के सजीले लिबास ईद की नमाज के लिए तैयार करवाते हैं। ईद-उल-फितर मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा त्योहार होता है। ईद के दिन सुबह सभी घरों में सिवैयां और कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं तथा तमाम रिश्तेदारों व दोस्तों को दावत देते हैं। वहीं ईद की नमाज सभी मिलकर ईदगाह पर अदा करते हैं।

रोजा अर्थ तकवा

उन्होंने बताया कि रमजान का पवित्र माह फिजा में इबादत और इनायत का खूबसूरत तालमेल सजा रहा है। रोजा का अर्थ तकवा है। इंसान रोजा रख कर अपने आप को ऐसा इंसान बनने की कोशिश करता है,जैसा उसका रब चाहता है। तकवा यानी अपने आप को बुराइयों से बचाना और भलाई को अपनाना है। रोजा केवल भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं कहा जाता है,रोजा इंसान के हर एक भाग का होता है। एक रोजा भी बगैर किसी कारण छोड़ दे तो वह पूरी जिंदगी रोजा रख कर भी उस एक रोजा का सबाब नहीं पा सकता है। जिस तरह आग से तपने के बाद सोना कंचन बनता है,उसी तरह इंसान रोजा रखने के बाद सच्चा इंसान बनता है। इफ्तार रोजे पूरे होने का वक्त तब होता है जब सूरज डूबता है।

बच्चे रखते हैं रोजे

इन दिनों गर्मी की तपिश में नौनिहाल बड़ी चाह से रोजे रख रहे हैं। छोटे बच्चे अल सुबह 2.30 बजे उठते ही खुशी- खुशी उमंग के साथ रोजा रखते हैं। सुबह 4 बजे सहरी के बाद शाम को सूर्यास्त पर रोजा खोलते हैं। इस दरम्यान बच्चे कुरान पढ़ते हैं। बड़ों के साथ नमाज भी अदा करते हैं। वहीं महिलाएं भी इस गर्मी में रोजेदार होते हुए भी घरों के सारे काम करती हैं और इफ्तार के लिए घर के दस्तार खान को बेहतरीन बनाने के लिए तरह-तरह के व्यंजन, लजीज खाने, शरबत, नमकीन व फल आदि सजाती हैं।

बांटते हैं जकात खैरात

माहे रमजान में अल्लाह की और से रहमत की बरसात होती है। इस पाक माह में अगर बंदा एक नेकी करता है तो उसके बदले अल्लाह उसको 70 नेकियों का सवाब देता है। वहीं रोजा रखने से इंसान बुराई छोड़कर अच्छाई की राह पर चलने लगता है। रमजान माह में शहर की मस्जिदों पर आकर्षक सजावट हो रही है। चांद दिखने के साथ ही मुस्लिमजनों में हर्ष की लहर दौड़ गई। चांद के दीदार के साथ ही रमजान माह का आगाज हो गया तथा कई जगहों पर आतिशबाजी कर लोगों ने माहे रमजान का स्वागत किया। एक दूसरे को बधाई देने के साथ नमाज अदा की। वहीं इस मुबारक महीने में मोमीन अपनी आमदनी से कुछ हिस्सा खैरात के लिए निकालता है और जरूरत मंदों - बेवाओं आदि की मदद करता है। इस महीने के आखिरी में आने वाले ईद- उल- फितर की खुशियों में शरीक होता है तथा हर मुसलमान सिदक दिल से अपनी कमाई का अपने घर में गहनों की जकात निकालता है।

इस बार 5 शुक्रवार

मुफ्ती मुहम्मद इल्यास मजाहिरी ने बताया कि इस बार पांच शुक्रवार यानि जुमा इस माह आ रहे हैं। अगर तीस रोजे पूरे हुए तो जुमातुल विदा पर ये महीना खत्म होगा। शनिवार को ईद होगी। पहला रोजा शुक्रवार को है। गुरुवार शाम को जैसे ही आसमान में रमजान का चांद दिखाई दिया। उसी के साथ कस्बे की मुस्लिम बस्तियों में खुशी का माहौल हो गया। हर तरफ से आतिशबाजी की आवाज आने लगी। सभी एक दूसरे को माहे रमजान की मुबारकबाद देने लगे। मुबारक बाद का सिलसिला एक दूसरे के घर जा जाकर देने का भी चलता रहा। रमजान के पहले ही दिन जुमा होने के कारण मुस्लिम समाज में उत्साह ज्यादा है। मस्जिदों में गुरुवार रात से विशेष नमाज तरावीह भी अदा की गई। जो पूरे माह ईद के चांद दिखाई देने तक जारी रहेगी।

करौली. शहर में रोजे पर शुक्रवार को नमाज अदा करते रोजेदार।

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