अधिक मास (पुरुषोत्तम) ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा शुरू हो गए,जो 13 जून तक चलेंगे। इस दौरान विवाह,गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे। वहीं शहर के प्रमुख मंदिरों में मनोरथों की धूम शुरू हो जाएगी। अधिक मास में किए गए दान-पुण्य और धार्मिक आयोजनों का कई गुना फल मिलता है।
राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जति ने बताया कि पुरुषोत्तम माह में शहर के विभिन्न मंदिरों में श्रीमद् भागवत कथा,भजन-कीर्तन और झांकियों की धूम शुरू हो जाएगी। जो पूरे एक माह तक जारी रहेंगी। धार्मिक मान्यता के मुताबिक पुरुषोत्तम मास में थोड़े दान का भी बड़ा पुण्य माना जाता है। जल मंदिर,बावड़ी,पक्षियों के लिए परिंडे,वृद्ध सेवा, अनाथों की सेवा आदि को विशेष फलदायी माना गया है।
इसलिए नहीं किए जाते हैं विवाह-मांगलिक कार्य
उन्होंने बताया कि सूर्य वर्ष के 12 महीनों में प्रतिमाह 12 राशियों में संचरण (संक्रमण) होता है, जिससे संवत्सर बनता है। अमावस्या से अमावस्या तक जिस माह में सूर्य का किसी भी राशि में संक्रमण (मास संक्रांति) नहीं होता है तो वह अधिकमास कहलाता है। कभी-कभी अमांत मास (एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या) में दो बार संक्रांति आ जाती है,उसे क्षय मास कहते हैं। अधिकमास और क्षय मास दोनों ही मलमास माने जाते हैं। इसलिए इनमें विवाह,गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।
तिरस्कृत मास को भगवान ने दिया था अपना नाम
राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जति ने बताया कि भारतीय काल गणना सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट गणितीय लक्ष्यों तक पहुंच जाती है। काल गणना में अध्यात्म का समावेश कर संवत्सर,अयन मास पक्ष,तिथि नक्षत्र,राशि सब के अलग-अलग नाम, स्वामी-देवता तय है। वहीं अधिकमास अतिरिक्त मास होने से उसका स्वयं का नाम, स्वामी देवता नहीं होते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है अधिक मास, क्या हैं हिंदुआें की मान्यताएं
उन्होंने बताया कि वैदिक काल से ही अधिक मास सूर्य वर्ष के मान व चंद्र वर्ष के मान में होने वाले अंतर में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 12 माह के स्थान पर 13 माह का कर दिया जाता है। इस अतिरिक्त एक माह को अधिक मास कहते हैं। अधिक मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती है। सूर्य वर्ष का मान 365 दिन माना जाता है,जबकि चंद्र वर्ष का मान 354 दिन का ही होता है यानी सूर्य-चंद्र के वर्ष में अंतर होता है। तीन साल में यह अंतर एक माह का हो जाता है। तीन साल बाद दोनों वर्षों में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 13 माह का हो जाता है। इसलिए हर तीन साल बाद अधिकमास की पुनरावृत्ति होती है। इससे पहले वर्ष 2007 में ज्येष्ठ माह में अधिक मास था।
अधिक मास में किए गए दान-पुण्य और धार्मिक आयोजनों का कई गुना फल मिलता है
नगर संवाददाता | करौली
अधिक मास (पुरुषोत्तम) ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा शुरू हो गए,जो 13 जून तक चलेंगे। इस दौरान विवाह,गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे। वहीं शहर के प्रमुख मंदिरों में मनोरथों की धूम शुरू हो जाएगी। अधिक मास में किए गए दान-पुण्य और धार्मिक आयोजनों का कई गुना फल मिलता है।
राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जति ने बताया कि पुरुषोत्तम माह में शहर के विभिन्न मंदिरों में श्रीमद् भागवत कथा,भजन-कीर्तन और झांकियों की धूम शुरू हो जाएगी। जो पूरे एक माह तक जारी रहेंगी। धार्मिक मान्यता के मुताबिक पुरुषोत्तम मास में थोड़े दान का भी बड़ा पुण्य माना जाता है। जल मंदिर,बावड़ी,पक्षियों के लिए परिंडे,वृद्ध सेवा, अनाथों की सेवा आदि को विशेष फलदायी माना गया है।
इसलिए नहीं किए जाते हैं विवाह-मांगलिक कार्य
उन्होंने बताया कि सूर्य वर्ष के 12 महीनों में प्रतिमाह 12 राशियों में संचरण (संक्रमण) होता है, जिससे संवत्सर बनता है। अमावस्या से अमावस्या तक जिस माह में सूर्य का किसी भी राशि में संक्रमण (मास संक्रांति) नहीं होता है तो वह अधिकमास कहलाता है। कभी-कभी अमांत मास (एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या) में दो बार संक्रांति आ जाती है,उसे क्षय मास कहते हैं। अधिकमास और क्षय मास दोनों ही मलमास माने जाते हैं। इसलिए इनमें विवाह,गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।
तिरस्कृत मास को भगवान ने दिया था अपना नाम
राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जति ने बताया कि भारतीय काल गणना सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट गणितीय लक्ष्यों तक पहुंच जाती है। काल गणना में अध्यात्म का समावेश कर संवत्सर,अयन मास पक्ष,तिथि नक्षत्र,राशि सब के अलग-अलग नाम, स्वामी-देवता तय है। वहीं अधिकमास अतिरिक्त मास होने से उसका स्वयं का नाम, स्वामी देवता नहीं होते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है अधिक मास, क्या हैं हिंदुआें की मान्यताएं
उन्होंने बताया कि वैदिक काल से ही अधिक मास सूर्य वर्ष के मान व चंद्र वर्ष के मान में होने वाले अंतर में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 12 माह के स्थान पर 13 माह का कर दिया जाता है। इस अतिरिक्त एक माह को अधिक मास कहते हैं। अधिक मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती है। सूर्य वर्ष का मान 365 दिन माना जाता है,जबकि चंद्र वर्ष का मान 354 दिन का ही होता है यानी सूर्य-चंद्र के वर्ष में अंतर होता है। तीन साल में यह अंतर एक माह का हो जाता है। तीन साल बाद दोनों वर्षों में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 13 माह का हो जाता है। इसलिए हर तीन साल बाद अधिकमास की पुनरावृत्ति होती है। इससे पहले वर्ष 2007 में ज्येष्ठ माह में अधिक मास था।
नगर संवाददाता | करौली
अधिक मास (पुरुषोत्तम) ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा शुरू हो गए,जो 13 जून तक चलेंगे। इस दौरान विवाह,गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे। वहीं शहर के प्रमुख मंदिरों में मनोरथों की धूम शुरू हो जाएगी। अधिक मास में किए गए दान-पुण्य और धार्मिक आयोजनों का कई गुना फल मिलता है।
राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जति ने बताया कि पुरुषोत्तम माह में शहर के विभिन्न मंदिरों में श्रीमद् भागवत कथा,भजन-कीर्तन और झांकियों की धूम शुरू हो जाएगी। जो पूरे एक माह तक जारी रहेंगी। धार्मिक मान्यता के मुताबिक पुरुषोत्तम मास में थोड़े दान का भी बड़ा पुण्य माना जाता है। जल मंदिर,बावड़ी,पक्षियों के लिए परिंडे,वृद्ध सेवा, अनाथों की सेवा आदि को विशेष फलदायी माना गया है।
इसलिए नहीं किए जाते हैं विवाह-मांगलिक कार्य
उन्होंने बताया कि सूर्य वर्ष के 12 महीनों में प्रतिमाह 12 राशियों में संचरण (संक्रमण) होता है, जिससे संवत्सर बनता है। अमावस्या से अमावस्या तक जिस माह में सूर्य का किसी भी राशि में संक्रमण (मास संक्रांति) नहीं होता है तो वह अधिकमास कहलाता है। कभी-कभी अमांत मास (एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या) में दो बार संक्रांति आ जाती है,उसे क्षय मास कहते हैं। अधिकमास और क्षय मास दोनों ही मलमास माने जाते हैं। इसलिए इनमें विवाह,गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।
तिरस्कृत मास को भगवान ने दिया था अपना नाम
राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जति ने बताया कि भारतीय काल गणना सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट गणितीय लक्ष्यों तक पहुंच जाती है। काल गणना में अध्यात्म का समावेश कर संवत्सर,अयन मास पक्ष,तिथि नक्षत्र,राशि सब के अलग-अलग नाम, स्वामी-देवता तय है। वहीं अधिकमास अतिरिक्त मास होने से उसका स्वयं का नाम, स्वामी देवता नहीं होते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है अधिक मास, क्या हैं हिंदुआें की मान्यताएं
उन्होंने बताया कि वैदिक काल से ही अधिक मास सूर्य वर्ष के मान व चंद्र वर्ष के मान में होने वाले अंतर में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 12 माह के स्थान पर 13 माह का कर दिया जाता है। इस अतिरिक्त एक माह को अधिक मास कहते हैं। अधिक मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती है। सूर्य वर्ष का मान 365 दिन माना जाता है,जबकि चंद्र वर्ष का मान 354 दिन का ही होता है यानी सूर्य-चंद्र के वर्ष में अंतर होता है। तीन साल में यह अंतर एक माह का हो जाता है। तीन साल बाद दोनों वर्षों में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 13 माह का हो जाता है। इसलिए हर तीन साल बाद अधिकमास की पुनरावृत्ति होती है। इससे पहले वर्ष 2007 में ज्येष्ठ माह में अधिक मास था।
नगर संवाददाता | करौली
अधिक मास (पुरुषोत्तम) ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा शुरू हो गए,जो 13 जून तक चलेंगे। इस दौरान विवाह,गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे। वहीं शहर के प्रमुख मंदिरों में मनोरथों की धूम शुरू हो जाएगी। अधिक मास में किए गए दान-पुण्य और धार्मिक आयोजनों का कई गुना फल मिलता है।
राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जति ने बताया कि पुरुषोत्तम माह में शहर के विभिन्न मंदिरों में श्रीमद् भागवत कथा,भजन-कीर्तन और झांकियों की धूम शुरू हो जाएगी। जो पूरे एक माह तक जारी रहेंगी। धार्मिक मान्यता के मुताबिक पुरुषोत्तम मास में थोड़े दान का भी बड़ा पुण्य माना जाता है। जल मंदिर,बावड़ी,पक्षियों के लिए परिंडे,वृद्ध सेवा, अनाथों की सेवा आदि को विशेष फलदायी माना गया है।
इसलिए नहीं किए जाते हैं विवाह-मांगलिक कार्य
उन्होंने बताया कि सूर्य वर्ष के 12 महीनों में प्रतिमाह 12 राशियों में संचरण (संक्रमण) होता है, जिससे संवत्सर बनता है। अमावस्या से अमावस्या तक जिस माह में सूर्य का किसी भी राशि में संक्रमण (मास संक्रांति) नहीं होता है तो वह अधिकमास कहलाता है। कभी-कभी अमांत मास (एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या) में दो बार संक्रांति आ जाती है,उसे क्षय मास कहते हैं। अधिकमास और क्षय मास दोनों ही मलमास माने जाते हैं। इसलिए इनमें विवाह,गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।
तिरस्कृत मास को भगवान ने दिया था अपना नाम
राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जति ने बताया कि भारतीय काल गणना सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट गणितीय लक्ष्यों तक पहुंच जाती है। काल गणना में अध्यात्म का समावेश कर संवत्सर,अयन मास पक्ष,तिथि नक्षत्र,राशि सब के अलग-अलग नाम, स्वामी-देवता तय है। वहीं अधिकमास अतिरिक्त मास होने से उसका स्वयं का नाम, स्वामी देवता नहीं होते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है अधिक मास, क्या हैं हिंदुआें की मान्यताएं
उन्होंने बताया कि वैदिक काल से ही अधिक मास सूर्य वर्ष के मान व चंद्र वर्ष के मान में होने वाले अंतर में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 12 माह के स्थान पर 13 माह का कर दिया जाता है। इस अतिरिक्त एक माह को अधिक मास कहते हैं। अधिक मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती है। सूर्य वर्ष का मान 365 दिन माना जाता है,जबकि चंद्र वर्ष का मान 354 दिन का ही होता है यानी सूर्य-चंद्र के वर्ष में अंतर होता है। तीन साल में यह अंतर एक माह का हो जाता है। तीन साल बाद दोनों वर्षों में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 13 माह का हो जाता है। इसलिए हर तीन साल बाद अधिकमास की पुनरावृत्ति होती है। इससे पहले वर्ष 2007 में ज्येष्ठ माह में अधिक मास था।