मनोज जैन | आसपुर (डूंगरपुर)
आसपुर उपखंड की लीलवासा ग्राम पंचायत के राजस्व गांव जसपुर झापका के काश्तकारों की मेहनत से गांव की तकदीर बदल गई है। करीब 8 वर्ष पहले छोटे स्तर पर शुरू की गई प्याज की खेती का पूरा लाभ काश्तकारों को अब मिलना शुरू हो गया है। इस वर्ष किसानों ने करीब 400-500 टन प्याज की उपज ली है, जिसकी कीमत 40 से 50 लाख रुपए तक है। इससे काश्तकारों की आर्थिक स्थिति को संबल मिला है, वहीं जिले में गांव को नई पहचान मिली है। जसपुर झापका आसपुर-डूंगरपुर मुख्य मार्ग से करीब 3 किमी अंदर बसा हुआ है। गांव के 100 काश्तकार प्याज की खेती कर रहे हैं। करीब 8 वर्ष पूर्व गांव में छोटे स्तर पर प्याज की खेती शुरू हुई थी। अनुकूल जमीन और परिस्थितियों के चलते पैदावार बढ़ी तो दूसरे काश्तकारों ने भी प्रयोग किया। वर्तमान में प्रत्येक काश्तकार ने करीब 50 क्विंटल प्याज की उपज ली है। पहाड़ी क्षेत्र होने से यहां सिंचाई का मुख्य साधन कुएं हैं, पर निचले हिस्से में नहरी पानी का उपयोग होता है। इन दिनों तैयार फसल को निकालने का काम चल रहा है। काश्तकारों की मानें तो इस बार करीब 500 टन प्याज की उपज हुई है।
प्याज की बंपर पैदावार ने बदली किसानों की तकदीर
आसपुर (डूंगरपुर). जसपुर झापका में प्याज की बंपर पैदावार देखते वैज्ञानिक।
आर्थिक स्थिति सुधरी, तो किसानों ने खरीदे वाहन : इधर, काश्तकार गेहूं जैसी फसल की खेती केवल जरूरत के तौर पर ही करते हैं, क्योंकि कम जगह में होने वाली प्याज की खेती ज्यादा मुनाफा देती है। सहकारी समिति से लिए ऋण भी समय पर अदा हो रहे हैं। आर्थिक स्थिति सुधरने से किसान ट्रैक्टर और पिकअप जैसे वाहन भी खरीद लाए हैं। इन वाहनों को खेती के साथ गांव-गांव जाकर प्याज बेचने के भी काम लिया जा रहा है।
कृषि विज्ञान केंद्र ने समय-समय पर दिए प्रशिक्षण : कृषि विज्ञान केंद्र फलोज की ओर से किसानों को प्याज के हाइब्रिड बीज मुहैया कराए गए। वैज्ञानिकों ने समय-समय पर खेतों का निरीक्षण किया और प्रशिक्षण दिया। गांव में बीज बोने के बाद कृषि पर्यवेक्षकों और वैज्ञानिकों की देखरेख में फसलें तैयार होती हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. बीएल रोत ने बताया कि किसान उन्नत खेती में वैज्ञानिक तरीकों का पूरा उपयोग कर रहे हैं, इस कारण फायदा मिल रहा है।