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प्राकृतिक आपदा पर किए किसी भी काम को महत्व मिलेगा

3 वर्ष पहले
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इस गुरुवार को जब मैंने ऊंची आवाज में अखबार की यह हेडलाइन पढ़ी, ‘इस साल देश में सामान्य बारिश होगी,’ तो मेरे घर आए एक युवा मेहमान ने तपाक से पूछा, ‘यह कौन कह रहा है?’ और जब मैंने कहा, ‘एक प्राइवेट एजेंसी,’ तो उसके चेहरे पर राहत का भाव आया और उसने कहा, ‘तो फिर यह सही होना चाहिए, क्योंकि मुझे अपने मौसम विभाग पर भरोसा नहीं है।’ मेरा अगला प्रश्न था, ‘जलवायु परिवर्तन से तुम क्या समझते हो?’ उसके जवाब उतने अच्छे नहीं थे, जितनी उसकी राय थी।

23 मार्च 2018 को मैंने ‘विश्व मौसम विज्ञान दिवस’ के मौके पर आईआईटी भुवनेश्वर के प्रोफेसर एमेरिटस पीसी मोहंती का भाषण सुना था तो उन्हें उद्‌धृत करते हुए मैंने कहा, ‘ चक्रवातों की संख्या, गरज के साथ तूफान और लू चलने की घटनाएं वैसी ही रहेंगी जैसी कई बरसों से है पर उनकी तीव्रता कहीं अधिक हो जाएगी, इसलिए वे विनाशक ही होंगी। यही वजह है कि मौजूदा जरूरत जलवायु परिवर्तन को बेहतर ढंग से, जल्दी समझने और लोगों को पहले से आगाह करने की है ताकि जान-माल को बचाएगा जा सके। इसलिए प्राकृतिक आपदाओं के संदर्भ में अब से आगे वैज्ञानिक पूर्वानुमानों की बहुत बड़ी भूमिका रहेगी।’

इस बातचीत से मुझे 2015 में पद्‌मश्री से अलंकृत चेवांग नोरफेल की रोचक कहानी याद आई जिन्हें, ‘आइसमैन ऑफ इंडिया’ के निकनेम से भी जाना जाता है।

बरसों पहले लद्‌दाख में कड़कड़ाती ठंड की एक सुबह युवा व जिज्ञासु ग्रामीण बालक के रूप में नोरफेल ने आधे जमे पाइप से पानी निकलते, नीचे जमीन पर एक गड्‌ढे में एकत्रित होते और किसी ग्लैशियर की तरह जमते देखा। वे लद्‌दाख में एकदम अलग ही जलवायु को देखते हुए बड़े हुए थे, जहां किसी को फ्रास्ट बाइट( ठंड से अंग सुन्न होना) हो सकता था तो लू भी लग सकती थी। उन्होंने देखा था कि कैसे किसानों वाली 80 फीसदी आबादी अप्रैल-मई में बोवाई के समय जलसंकट का सामना करती थी, क्योंकि ग्लैशियर वाली धाराएं जम जाती थीं और नदियों का प्रवाह इतना कम होता था कि पानी निकाला नहीं जा सकता था।

कुछ दशकों बाद 1986 में जम्मू-कश्मीर ग्रामीण विकास विभाग के सिविल इंजीनियर की भूमिका में नोरफेल ने अपने बचपन के निरीक्षण से प्रेरणा लेते हुए पहला कृत्रिम ग्लैशियर बनाकर स्थानीय लोगों के सामने मौजूद जलसंकट के समाधान की दिशा में नई जमीन तोड़ी। इनमें से 80 फीसदी जौ और गेहूं की खेती करने वाले किसान थे। अपने प्रयोग से उत्साहित नोरफेल ने लद्‌दाखभर में ऐसे 17 कृत्रिम ग्लेशियर बना दिए और ‘आइसमैन ऑफ इंडिया’ कहलाए। उनके ज्यादातर प्रोजेक्ट्स को हमारी सेना, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय एनजीओ और राज्य सरकार के कार्यक्रमों से पैसा मिलता है।

चौतीस साल की सेवा के बाद 1994 में वे अपने सरकारी पद से रिटायर हो गए। अब दुनियाभर के छात्र नोरफेल से सलाह लेने के लिए उनके घर इकट्‌ठा हो जाते हैं। जब वे फुर्सत में होते हैं तो किचन गार्डन में इस बारे में प्रयोग करते हैं कि कैसे मैदानों में उगाई जाने वाली सब्जियां जैसे शलजम, बैंगन, शिमला मिर्च और ककड़ी उगाकर अपने समुदाय को जलवायु परिवर्तन का फायदा पहुंचाया जाए। मुझे याद आने वाले दूसरे व्यक्ति हैं चेन्नई के प्रदीप जॉन, जिनके मौसम संबंधी अचूक पूर्वानुमानों ने कम से कम तमिलनाडु में तो उन्हें लोकप्रिय हस्ती बना दिया है और उनके फेसबुक पेज के 5.5 लाख फॉलोअर हैं। फेसबुक पर उनकी नवीनतम पोस्ट ‘तमिलनाडु वेदरमैन’ में आगाह किया गया है, ‘चेन्नई के खुशनुमा दिन जल्द ही विदा हो जाएंगे, क्योंकि इस साल पहली बार तापमान 36 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाएगा।’

प्रदीप 2006 से ब्लॉग लिख रहे हैं, जब उनके सिर्फ 100 फॉलोअर थे। 1 दिसंबर 2015 को चेन्नई बाढ़ के बारे में मौसमविज्ञानियों से काफी पहले घंटे-दर-घंटे व्यक्त पूर्वानुमानों ने उनके फॉलोअर की संख्या तब 75,000 तक पहुंचा दी थी।

फंडा यह है कि यदि आपको भूगोल से प्यार है तो क्लायमेटोलॉजी का अध्ययन करें अन्यथा जलवायु परिवर्तन पर कोई भी काम करे ताकि जान-माल को बचाया जा सके, क्योंकि इन अनिश्चितता वाले दिनों में इसे बहुत महत्व मिलने वाला है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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