भास्कर न्यूज | कवर्धा/ नेऊर
जिला मुख्यालय कवर्धा से 77 किमी दूर कांदावानी पंचायत का बांसाटोला गांव। एक हजार मीटर ऊंचे पहाड़ की तलहटी पर बसे इस गांव के लोग राशन के लिए बाहपानी जाते हैं, जो कि 2 किमी दूरी पर है। लेकिन रास्ता नहीं होने से उन्हें पैदल 9 किलोमीटर घूमकर वहां पहुंचना पड़ता है।
सड़क बनवाने के लिए लोक सुराज में मांग की गई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई तो ग्रामीणों ने बैठक कर बगैर सरकारी मदद के श्रमदान से रास्ता बनाने का फैसला किया। उन्होंने खुद अपने हाथों में गैंती- फावड़ा उठाया। दो हफ्ते पहले ग्रामीणों ने पहाड़ पर चट्टानों को काटना शुरू किया। मिट्टी हटाई और 12 दिन की कड़ी मेहनत से पहाड़ पर 2 किलोमीटर सीधा रास्ता बनाया। रास्ता बनने से दो गांव के बीच की दूरी 9 की जगह 7 किमी कम हो गई है। खास बात ये है कि बांसाटोला के 26 ग्रामीणों की जिद और जज्बे ने ये कमाल कर दिखाया है। इसमें महिलाओं ने भी भागीदारी निभाई।
53 बैगा परिवार रहते हैं: बाहपानी से 2 किमी दूर बांसाटोला की बसाहट है। दो किमी का यह इलाका पहाड़ी क्षेत्र है। इस बीहड़ में सिर्फ बैगा जनजाति समुदाय के लोग रहते हैं। आबादी 300 के आसपास है। कुल 53 बैगा परिवार रहते हैं, लेकिन राशन और लगने वाले साप्ताहिक बाजार में अन्य सामग्री खरीदने के लिए बाहपानी जाने सड़क नहीं है।
रास्ता बनने से बाहपानी पहुंचना आसान।
पहले 4 किमी मेन रोड तक पहुंचने के बाद फिर वहां से 5 किमी पैदल पथरीले रास्तों से पहुंचते थे बाहपानी
करीब एक हजार मीटर ऊंचे पहाड़ पर बसे बाहपानी में साप्ताहिक बाजार लगता है। राशन भी वहीं से लाते हैं। समस्या ये है कि बाहपानी पहुंचने के लिए सीधी सड़क नहीं है। बांसाटोला गांव से 4 किमी पैदल चलने पर मेन रोड आता है। फिर वहां से 5 किमी पैदल घुमावदार व पथरीले रास्तों से होकर बाहपानी पहुंचते हैं। इससे दूरी और समय ज्यादा लगता है, जिससे ग्रामीणों को दिक्कतें होती है।
छोटेलाल बैगा
जिद और जज्बा...एक हजार मीटर ऊंचे पहाड़ के नीचे बसे बांसाटोला के लोगों ने दिखाई एकजुटता, दो गांव की दूरी 9 की जगह 7 किमी हुई कम
कवर्धा. ग्राम बांसाटोला में पहाड़ को काटकर रास्ता बनाते ग्रामीण।
रास्ता बनाने रोज 3 घंटे करते थे काम: गांव के 26 लोगों ने पहाड़ पर रास्ता बनाने श्रमदान किया। वे रोज सुबह गैंती- फावड़ा और घमेला लेकर घर से निकलते। रास्ता बनाने के लिए पुरुष पत्थरों को काटते, तो महिलाएं मिट्टियां हटाती। इस रोज 12 दिन तक 3-3 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद रास्ता बनाने में कामयाबी मिली।
श्रमदान से ग्रामीणों ने पहले भी बनाई है सड़क
सीन 1. पंडरिया में छिंदीडीह पंचायत के आश्रित ग्राम अमीदा में 4 महीने पहले तक पहुंचविहीन गांव था। यहां के लोगों को भी राशन के लिए धोबे गांव तक पहुंचने के लिए मशक्कत करनी पड़ती थी। सरकारी मदद न मिलने पर गांव के लोगाें ने फैसला लिया, 7 दिन में श्रमदान से रास्ता बनाया।
सीन 2. एक साल पहले ग्राम पोलमी से राशन के लिए सजनखार गांव पहुंचने ऊंची-नीची पहाड़ी पर ग्रामीणाें को पैदल चलना पड़ता था। परेशानी से बचने के लिए 1 साल पहले ग्रामीणों ने खुद ही पहाड़ी पर समतल रास्ता बनाया।