कामनाओं से मुक्त होने के लिए स्वीकार भाव जरूरी
हर तरफ से आ रही दुराचार की खबरें व्यथित कर देती हैं। सही है कि कामना जैसी व्याधि नहीं। यदि गहराई से यह बोध हो जाए कि कामना पूरी भी हो जाए तो सुख नहीं है, तो बंधनों से मुक्ति संभव है। यह भाव अनुभव अथवा समझ से पैदा हो सकता है।
ओशो सिद्धार्थ औलिया ओशोधारा
अष्टावक्र कहते हैं, ‘हे जनक, कामना जैसी व्याधि नहीं और निष्कामना सी समाधि नहीं।’ कामना सबसे बड़ा रोग है, सबसे बड़ी बाधा है और इसका सर्वोत्तम उपाय है- निष्काम होना। बंध विषयों में रस लेने से कामना का आरंभ हो जाता है। बंध विषयों का अर्थ है, स्वयं को उस चीज़ से बांध लेना जिसके बगैर भी अब तक आप मजे में थे। जैसे, आपने किसी के पास कोई अच्छी कार देखी और आपके मन में ख़याल आ गया कि काश ऐसी एक कार मेरे पास भी होती! कार के प्रति इस रस के कारण अब आपका चिंतन कार से बंध जाएगा और दिन-रात आपके मन में इसकी योजना बनती रहेगी। यह रस ही बंधन का, तमाम दुखों का कारण है।
विरस या निष्काम होना ही इसका उपाय है। इसके दो तरीके हैं-एक, अनुभव से और दूसरा, समझ से। किसी कार में आप बैठें और आपको अनुभव हो जाए कि कुछ खास मजा नहीं आया, तो कार की आपकी कामना विदा हो सकती है। बुद्ध को वैराग्य अनुभव से उपजा। पिता शुद्धोधन नहीं चाहते थे कि बेटा वैरागी हो, इसलिए उन्होंने बेटे के लिए तमाम सुख-सुविधाएं जुटा दी थीं। अगर उन्होंने वैसा न किया होता, तो संभव है बुद्ध संन्यासी न हुए होते, क्योंकि वही सुख-सुविधाएं बुद्ध के लिए सहायक हो गईं। उन्होंने जान लिया इसमें सुख नहीं है। दूसरा यानी समझ का मार्ग कबीर का मार्ग है। बुद्ध महल में रहकर जान पाए थे कि महलों में सुख नहीं है लेकिन, कबीर ने झोपड़ी में ही रहकर इस तथ्य को जान लिया। बुद्ध बहुत शिक्षित थे, कबीर अनपढ़। लेकिन सरल, ग्रामीण परिवार में रहकर भी उन्होंने जान लिया कि महलों में, सुरा-सुंदरियों में सुख नहीं है। कबीर का मार्ग समझ का मार्ग है।
बंध विषयों से मुक्ति के दो ही मार्ग हैं। पहली राह यह है कि अनुभव हो जाए कि पता नहीं, लोग क्यों इसके पीछे भाग रहे हैं, जबकि इसमें तो कोई सुख नहीं है, क्योंकि जो लोग भोग कर रहे हैं, वे तमाम दुःख, तनाव, पीड़ा और संताप में हैं। भारत के लोगों की निराशा इस कारण से है कि जो पाना चाहते थे, वह नहीं पा सके। पश्चिम की निराशा भारत की निराशा से बहुत बड़ी है, क्योंकि जो भी पाना था उसे उन्होंने पा लिया है, फिर भी सुख नहीं मिला। इस अर्थ में, सफलता ही पश्चिम के लोगों की निराशा बन गई। अगर आपको यह बोध हो जाए कि यदि आपको भी यह सब उपलब्ध हो जाए तब भी क्या मिल जाएगा, तो आप बंध से मुक्त हो सकते हैं। दूसरा मार्ग यह है कि विषय को जी लीजिए और फिर जानिए कि जिसे आप पाना चाहते थे, उसे पाकर भी आप आनंदित नहीं हो सके हैं। दोनों में से जिस भी मार्ग से आप जान पाएं, उसी दिन आप विषय से, कामना से मुक्त हो जाएंगे। यही केंद्रीय तत्व है।
जो कामना से मुक्त न हुआ, वह क्रोधी हो जाता है। क्रोध क्या है? - ध्यायते विषयान्पुसं संगस्ते सूप जायते, संगात् संजायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते। कामना की बाधा व्यक्ति को क्रोधी बनाती है। क्रोध से मुक्ति तभी संभव है, जब आप कामना से मुक्त हो जाएं। कामना से मुक्ति समझ के मार्ग से ही संभव है। हम कथा गढ़ते रहते हैं कि यदि हमारी फलां कामना पूरी हो जाए, कुछ अनुकूल हो जाए तो हम सुखी हो जाएंगे। लेकिन जिसकी इच्छा पूरी हो गई, वे भी सुखी नहीं हो पाए। सिकंदर की कथा तो आप जानते ही हैं। इन कामनाओं को छोड़कर ही हम कामना से मुक्त हो सकते हैं। जैसे ही आप के भीतर यह भाव घर करता है कि अनुकूल हमारे लिए अच्छा होगा या प्रतिकूल और जो भी होगा, अच्छे के लिए ही होगा, उसी दिन आप काम से मुक्त हो जाते हैं। यह स्वीकार्यता का भाव समझ अथवा अनुभव के आधार पर ही जन्म ले सकता है। अष्टावक्र जब साक्षी भाव कहते हैं तो आशय यही होता है।