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सुस्त निर्यात में निवेशकों को लुभाना भारत की जरूरत

3 वर्ष पहले
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वर्ष 1991 के वसंत के दौरान भारतीय अधिकारियों ने भुगतान संतुलन का संकट टालने की बेचैनी में चुपचाप स्मगलरों से जब्त 20 टान सोना उठाकर स्विट्जरलैंड की यूबीएस बैंक में जमा कर दिया था। उस संकट ने उदारवादी सुधारों की प्रेरणा दी, जिसने भारत को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ने में मदद की। 2013 आते-आते जीडीपी के प्रतिशत के रूप में भारत का निर्यात चार गुना बढ़कर 25 फीसदी हो गया, जो वैश्विक औसत से बहुत दूर नहीं था। उसके बाद से निर्यात में आई गिरावट ने आंकड़ों को 14 साल में न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया। आयात में वृद्धि ने चालू खाते के बढ़ते घाटे को पाटने की सरकार की क्षमता पर नहीं, तो कम से कम भारतीय कंपनियों की स्पर्धात्मक क्षमता पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब 1991 के ड्रामा का दोहराव तो नहीं होने वाला। आज भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया को मात देने वाली रफ्तार से बढ़ रही है। इसके केंद्रीय बैंक में इतना विदेशी मुद्रा भंडार है कि वह करीब सालभर के आयात का भुगतान कर सकता है। विदेशी निवेशक सरकार व कॉर्पोरेट ऋण फाइनेंस करने को तैयार हैं। फिर भी अर्थशास्त्री सोच में पड़ गए हैं कि भारत निर्यात क्यों नहीं बढ़ा पा रहा है, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है।

मार्च 2018 तक के 12 महीनों में 303 अरब डॉलर का भारतीय माल विदेश में गया। यह पिछले साल से अधिक है लेकिन, अब भी 2014 में हासिल 310 अरब डॉलर के आंकड़ें से कम है। तब भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार आज की तुलना में 25 फीसदी कम था। इस बीच, आयात बढ़कर 460 अरब डॉलर हो गया, जिसने व्यापार घाटे को 157 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया, जो 2016-17 के 109 अरब डॉलर से ज्यादा और पांच साल में अधिकतम है। आईटी अाउटसोर्सिंग जैसी सेवाओं के सरप्लस से कुल व्यापार घाटे को करीब आधा कम करने में मदद मिलती है पर अब वहां भी निर्यात की तुलना में आयात बढ़ रहा है। यह घाटा कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से और बढ़ रहा है, जिसे भारत बहुत बड़ी मात्रा में आयात करता (िजसका कुछ हिस्सा रिफाइंड प्रोडक्ट के रूप में बेचा भी जाता है) है। 2016 में तेल की कीमत 30 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब 70 डॉलर तक पहुंच गई है, जिससे भारत के चालू खाते के मौजूदा घाटे का कारण पता चलता है। यह घाटा इस वित्तीय वर्ष में जीडीपी के 2 फीसदी तक पहुंच जाएगा, जो पिछले साल की तुलना में तिगुना होगा। पूरी अर्थव्यवस्था में निर्यातक गत जुलाई में लागू हुए जीएसटी के कमजोर क्रियान्वयन से त्रस्त हैं। निर्यातकों का शायद 100 अरब रुपए का रिफंड बकाया है, जिसे सख्त प्रशासन ने रोक रखा है। यह स्थिति तब हैं जब कई कंपनियां अभी नवंबर 2016 की नोटबंदी से उबर ही रही हैं। नोटबंदी ने स्थानीय सप्लाई चैन ठप कर दी, जिससे विदेशी प्रतिद्वंद्वियों को वे ऑर्डर पूरे करने का मौका मिल गया, जो लड़खड़ाती भारतीय कंपनियों को मिलते और इस तरह उन्होंने भारत में मार्केट शेयर हासिल कर लिया। ये सारी चिंताएं अर्थव्यवस्था की शाश्वत कमजोरियों से अलग है। जकड़ने वाली लालफीताशाही के कारण ज्यादातर भारतीय कंपनियां छोटी ही रह गईं। देश में ऐसी मेगा-फैक्ट्रियां नहीं हैं, जहां हजारों श्रमिक टी-शर्ट या मोबाइल फोन बनाते हो, एशिया के अन्य देशों में ऐसे दृश्य आम हैं।

बड़ी कंपनियों को फलने-फूलने में मददगार श्रम और भूमि-अधिग्रहण संबंधी सुधार लागू करने की बजाय, भारत सरकार अपने उद्योगों को विदेशी स्पर्धा से बचाने में लगी है। हाल के महीनों में इसने मोबाइल फोन से लेकर पतंग तक चकरा देने वाली संख्या में सामानों पर शुल्क लगाए हैं। बेशक इससे आयात पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी पर उतनी ही आशंका यह भी होगी कि अन्य सरकारों के व्यापारिक कदम भारत का निर्यात कमजोर कर देंगे। यह भारत का दुर्भाग्य है कि डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका ट्रेड सरप्लस का इसका सबसे बड़ा स्रोत है। ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर कई हमले किए हैं चाहे कथित निर्यात सब्सिडी पर चीख-पुकार हो, भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए वीज़ा हासिल करना कठिन बनाना हो या भारत पर कृत्रिम रूप से अपनी मुद्रा को कमजोर करने का आरोप हो। अमेरिका के कई सहयोगियों के विपरीत भारत को आसन्न स्टील शुल्कों से छूट नहीं दी गई है।

इस व्यापारिक संघर्ष के और बढ़ने पर भारत को गंभीर नुकसान होगा। न सिर्फ आयात के भुगतान व आर्थिक वृद्धि के लिए बल्कि बाहर से लिया ऋण चुकाने के लिए भी निर्यात से कमाई हार्ड करेंसी की जरूरत है। यह कर्ज करीब 500 अरब डॉलर (33.5 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच गया है, जो जीडीपी के पांचवें हिस्से के बराबर है। इसमें से 40 फीसदी से अधिक सालभर से भी कम समय में चुकाना है। डीबीएस बैंक के अर्थशास्त्री कहते हैं, ‘यह और गिरते व्यापार ने बाहर से होने वाले फाइनेंस का जोखिम फिर राडार पर ला दिया है।’ निर्यात व आयात का अंतर पाटने के लिए भारत को विदेशी निवेशकों की आवश्यकता है और उन्हें लुभाने के लिए हाल ही में उसने बाहरी लोगों के लिए अल्पावधि के बॉन्ड खरीदना आसान बना दिया है। एक अनुुकूल वैश्विक आर्थिक वातावरण में इन चीजों का ज्यादा महत्व नहीं होता लेकिन, उभरते बाजार के घाटे में निवेश करने की निवेशकों की भूख घटती-बढ़ती रहती है। अमेरिका में 2013 में कड़ी मौद्रिक नीति के दौर में उभरते बाजारों से पैसा तेजी से बाहर चला गया था। ऐसे वैश्विक उतार-चढ़ाव से भारत बच जाता था। किंतु व्यापार के कमजोर रिकॉर्ड का मतलब है अब ऐसे उतार-चढ़ाव के चलते इसका जोखिम बढ़ गया है।

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अर्थव्यवस्था... द इकोनॉमिस्ट ने कहा- घरेलू अर्थव्यवस्था की शाश्वत कमजोरियों और अमेरिका के हाल के संरक्षणवाद के कारण भारत के लिए विदेश में अधिक माल बेचना कठिन हो गया है। लालफीताशाही से भी पिछड़ रही हैं कंपनियां।

निर्यातक जीएसटी के कमजोर क्रियान्वयन से त्रस्त हैं। उनका शायद 100 अरब रुपए का रिफंड बकाया है। इसकी पूर्ति छोटे निर्यातक नहीं कर सकते। इससे भी खराब बात यह है कि फरवरी में हीरे के एक डीलर द्वारा की गई 2 अरब डॉलर की धोखाधड़ी के बाद नियामकों ने कुछ बैंक गारंटियों पर रोक लगा दी, जिनका इस्तेमाल निर्यातक इसलिए करते थे।

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