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एक हो या कई दल, बहुमत के प्रमाण से मिलता है सरकार बनाने का न्यौता

3 वर्ष पहले
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कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी (222 में से 104 सीटें) बनने के बाद भी भाजपा के लिए सरकार बनाना मुश्किल हो गया। जबकि पिछले कुछ साल में तो वह काफी पीछे रहकर भी कई राज्यों में सरकार बनाने में सफल रही। ये राज्य मेघालय, गोवा तथा मणिपुर रहे हैं। बिहार में भी सबसे बड़ा दल न होकर भाजपा सत्ता में है। मगर सरकार बनाने की यही तरकीब इस बार उसके गले की फांस बनी। कर्नाटक में जब राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते उसे सरकार बनाने का न्यौता दिया तो विरोधियों ने सवाल खड़े किए। इसलिए भी कि यहां बहुमत का आंकड़ा कांग्रेस तथा जनता दल सेक्यूलर के पास था। वैसे तो आदर्श स्थिति में एक पार्टी हो या कई दलों का समूह, राज्यपाल उसी को सरकार बनाने का न्यौता देते हैं जो बहुमत का प्रमाण पेश कर सके।

ये ताजा मामले जब सबसे बड़े दल हुए सरकार से बाहर

गोवा: यहां मार्च 2017 में चुनाव हुए। किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका है। कांग्रेस को 40 में से सबसे अधिक 17 सीटें मिलीं। वहीं भाजपा 13 सीट के साथ दूसरे स्थान पर रही। तब यहां कांग्रेस ने राज्यपाल मृदुला सिन्हा के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया था। मगर राज्यपाल ने भाजपा और अन्य समर्थित दलों को सरकार बनाने का न्यौता दिया और वे सफल रहे। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया कि दावा पेश करने के बावजूद राज्यपाल ने उन्हें समय नहीं दिया।

मणिपुर: यहां भी मार्च 2017 में चुनाव हुए थे। कांग्रेस 60 में से 28 सीट लाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। मगर सरकार 21 सीट वाली भाजपा ने बनाई। भाजपा ने राज्य की स्थानीय पार्टियों से हाथ मिलाया। और 32 विधायकों के समर्थन की बात करते हुए राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला के सामने सरकार बनाने का दावा पेश किया। राज्यपाल ने भाजपा को न्यौता दिया। तब यहां कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने षड्यंत्र का आरोप लगाया और कहा कि स्पष्ट बहुमत न होने पर सबसे बड़ी पार्टी को न्यौता देने का नियम है।

यहां भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

महाराष्ट्र: 1999 में कांग्रेस ने 288 में से 75 सीट हासिल कीं। मगर भाजापा-शिवसेना 125 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। तब राज्यपाल ने कांग्रेस को सरकार बनाने का न्यौता दिया। जम्मू-कश्मीर: 2002 में नेशनल कांफ्रेेस ने यहां 87 में से 28 सीटें जीती थीं। गवर्नर ने 15 विधायकों वाली पीडीपी व 21 विधायकों वाली कांग्रेस के गठबंधन को न्यौता दिया।

झारखंड: 2005 में यहां भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी। 81 सीटों में से उसे 30 मिली थीं। मगर 17 सीट वाली झामुमो और अन्य समर्थित पार्टियों को सरकार बनाने का न्यौता दिया गया।

कर्नाटक में सरकार बनाने को लेकर शुरू हुआ ड्रामा शनिवार को चरम पर रहा। इसलिए कि राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी बनी भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता िदया था। जो असफल रही। जबकि 2006 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में स्पष्ट है कि एक पार्टी हो या कई पार्टियों का दल, चुनाव के पहले का गठबंधन हो या चुनाव बाद का, सरकार बनाने का न्यौता उसे ही मिलता है, जिसके पास बहुमत का प्रमाण हो।

मेघालय: यहां इसी साल मार्च में विधानसभा के चुनाव हुए। कांग्रेस 60 में से 21 सीट लाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। यहां भाजपा के हाथ सिर्फ 2 सीटें लगीं। मगर भाजपा ने नेशनल पीपुल्स पार्टी और छोटी स्थानीय पार्टियों के साथ गठबंधन किया और 34 विधायकों का समर्थन जुटा लिया। यानी बहुमत के आंकड़े से 3 ज्यादा। राज्यपाल गंगा प्रसाद ने नेशनल पीपुल्स पार्टी को सरकार बनाने का न्यौता दिया। पार्टी के अध्यक्ष कोनराड संगमा बहुमत साबित करने में सफल रहे और मुख्यमंत्री बने।

बिहार: यहां अक्टूबर-नवंबर 2015 में चुनाव हुए थे। लालू यादव की पार्टी आरजेडी 243 में से 80 सीट लाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। 71 सीटों के साथ नीतीश कुमार की पार्टी जदयू दूसरे स्थान पर रही। कांग्रेस 27 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही। यहां आरजेडी, जदयू, कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई। नीतीश जुलाई 2017 में महागठबंधन से अलग हो गए। इसके बाद उन्होंने बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई। यानी सबसे बड़ी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई।

कर्नाटक: 4 चेहरे जो रहे सुर्खियों में...

कर्नाटक में सरकार बनाने की जोड़-तोड़ में केंद्रीय नेताओं के साथ 4 और चेहरे चर्चित रहे। इनमें भी ज्यादा नजरें भाजपा विधायक दल के नेता येदियुरप्पा पर टिकी रहीं।

सिद्धारमैया

कर्नाटक के पिछले मुख्यमंत्री। भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे, लेकिन कांग्रेस ने इनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा। जब पार्टी ने जेडीएस को आगे किया तो इनके मुख्यमंत्री बनने की कोई उम्मीद नहीं रही।

वजुभाई वाला

कर्नाटक के राज्यपाल। नरेंद्र मोदी 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, तब 9 साल ये वित्तमंत्री थे। वे कांग्रेस-जेडीएस के बजाय भाजपा को न्यौता देकर चर्चा में हैं।

बीएस येदियुरप्पा

कर्नाटक में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा। 2008 में वे मुख्यमंत्री बने थे। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरने के बाद 2011 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। बीजेपी से निकाल दिए गए। इस चुनाव से पहले फिर बीजेपी में आए।

एचडी कुमारस्वामी

पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के बेटे। चुनावी नतीजों से पहले किंगमेकर बनने की उम्मीद लगाए हुए थे। नतीजों के बाद कांग्रेस ने बिना शर्त मुख्यमंत्री बनने के लिए इन्हें आगे कर दिया।

अब तक क्या-क्या हुआ?

मंगलवार, 15 मई: कांग्रेस शासन वाले एकमात्र बड़े राज्य कर्नाटक के चुनाव परिणाम सामने आए। 222 सीटों के लिहाज से यहां बहुमत के लिए कम से कम 112 का आंकड़ा जरूरी था। कोई पार्टी इस अंक तक नहीं पहुंच सकी।

भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उसे पिछली बार के मुकाबले 64 सीटें ज्यादा मिलीं।

कांग्रेस को 78 सीटें ही मिलीं। उसे 44 सीटों का नुकसान हुआ।

जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) को 38 सीटें मिलीं, जिसमें बहुजन समाजपार्टी की 1 सीट शामिल। यानी इस बार पिछले चुनावों से दो सीट कम मिलीं।

2 सीट अन्य के खाते में गई।

इस खंडित जनादेश के बाद कांग्रेस-भाजपा दोनों के पास एक ही विकल्प बचा था। जेडीएस के साथ गठबंधन। यहां कांग्रेस ने दांव खेला। जेडीएस के नेता कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप स्वीकार करने की बात कहते हुए बिना शर्त समर्थन का ऑफर दे दिया। जेडीएस-कांग्रेस ने शाम 5.30 बजे राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। इनसे 20 मिनट पहले भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार बीएस येदियुरप्पा भी दावा पेश कर आए।

बुधवार, 16 मई: कांग्रेस के सभी 78 विधायकों को एक बस में बैठाकर बेंगलुरु से 40 किमी दूर इगलटन रिजॉर्ट भेज दिया गया। ताकि विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका न हो। इसी बीच जेडीएस नेता कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि भाजपा उनके कुछ विधायकों को 100-100 करोड़ रुपए का लालच देकर तोड़ने का प्रयास कर रही है।

इधर, राज्यपाल वजुभाई वाला ने भाजपा विधायक दल के नेता येदियुरप्पा को रात 9 बजे सरकार बनाने का न्यौता दिया। बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का समय भी दे डाला और अगले दिन सुबह 9 बजे शपथ लेना तय किया गया। इस फैसले के खिलाफ कांग्रेस-जेडीएस रात को ही सुनवाई की मांग लेकर चीफ जस्टिस के घर पहुंचे। रात 2.10 पर सुप्रीम कोर्ट खुला और गुरुवार तड़के 4.20 बजे तक सुनवाई चली। कोर्ट ने येदियुरप्पा की शपथ पर रोक तो नहीं लगाई, लेकिन शुक्रवार को उनसे कोर्ट में समर्थन-पत्र पेश करने की बात कही।

गुरुवार, 17 मई: येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शपथ के खिलाफ कांग्रेस-जेडीएस के नेताओं ने कर्नाटक विधानसभा के सामने धरना दिया।

खरीद-फरोख्त की आशंका से बचने के लिए जेडीएस के विधायकों को भी बेंगलुरु के एक होटल में ठहराया। देर रात इन्हें यहां से भी अन्य राज्य के रिजॉर्ट के लिए रवाना कर दिया गया। मगर इस बीच कांग्रेस के तीन तथा जेडीएस के दो विधायकों के गायब होने की खबर भी आई।

शुक्रवार, 18 मई: सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा पक्ष से सरकार बनाने के लिए जरूरी नंबर पेश करने के लिए कहा। भाजपा ने फ्लोर टेस्ट के दौरान आंकड़े पेश करने की बात कही। कोर्ट ने शनिवार 4 बजे फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया।

शनिवार, 19 मई: फ्लोर टेस्ट के लिए विधानसभा पहुंचे येदियुरप्पा ने बहुमत सिद्ध कर पाने में असमर्थता जताते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

क्या था और क्यों चर्चा में आया बोम्मई केस?

सितंबर 1988 में कर्नाटक में जनता पार्टी व लोक दल ने मिलकर जनता दल बनाई और सरकार बनाने का दावा किया। जनता दल ने एसआर बोम्मई के नेतृत्व में सरकार बनाई। दो दिन बाद जनता दल के ही विधायक केआर मोलाकेरी ने बोम्मई के खिलाफ राज्यपाल पी वेंकटसुबैया को अर्जी दी। साथ में 19 विधायकों की सहमति-पत्र भी था। इन 19 विधायकों ने सहमति पत्र में जाली हस्ताक्षर होना बताया और मामला कोर्ट पहुंचा। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत का फैसला विधानमंडल में किए जाने के आदेश दिए। ताजा मामला भी वैसा ही रहा।

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