दिव्य चीजें देखने के लिए आंखों से पढ़ना सीखें!
गुरुवार को जल्दी सुबह पचास पार की शुरुआती उम्र वाला वह युगल जिस तरह से सितारा दर्जे वाले होटल के उस रेस्तरां में आया, तो मेरे दिल ने कहा,‘ यह युगल अलग है, उसे पढ़ो’! पुरुष ने अपना हाथ पहले ही उन्हें सौंप रखा था और वे कोमलता से थामे हुई थीं। आप इस तरह के रिश्ते केवल फिल्मों के योजनाबद्ध फ्रेम में या उन युगलों में देखते हैं, जिनमें विशुद्ध प्रेम होता है। उनकी आंखें युवावस्था में जरूर सुंदर रही होंगी और आज वे सिकुड़ गई थीं। कंप्यूटर के जरूरत से ज्यादा उपयोग अथवा उम्र के कारण होगा। लेकिन, उनमें प्रेम और करुणा कम नहीं हुई थी। वे कोई खाली टेबल इस तरह से देख रही थीं जैसे कोई मां जाकर नश्ता लाने के पहले बच्चे को सुरक्षित बैठा देना चाहती हो। चूंकि यह रेस्तरां का व्यस्तता का वक्त था, कोई खाली टेबल खोजना थोड़ा कठिन था। इसके पहले कि मैं उन्हें इशारा करता कि मेरे निकट की टेबल खाली है, उनकी मछलियों जैसे आंखों ने उसे देख लिया। उन्होंने पुरुष साथी की कलाई को कसकर पकड़ा और टेबलों में से रास्ता निकालते हुए मेरे निकट तक पहुंचीं। उन्हें बिठाया और कहा, ‘मैं आपके लिए नाश्ता ला देती हूं।’ साफ रंग के स्मार्ट दिखाई दे रहे सज्जन ने सिर हिलाया। लेकिन, अचानक उन्होंने अपना फैसला बदला और उनसे कहा, ‘आप मेरे साथ आइए ताकि आप अपनी पसंद के नाश्ते का चुनाव कर सकें।’ उन सज्जन ने अपना हाथ उठाया जैसे कोई बच्चा मां से कहा रहा हो, ‘तो फिर मुझे ले चलो।’ मुस्कराते चेहरे के साथ उन्होंने उनका हाथ थामा, फिर से बहुत कोमलता के साथ और उन्हें काउंटर्स पर ले गईं, जहां विभिन्न डिश थीं दो प्लेट लेने की बजाय उन्होंने एक प्लेट ली और वे एक से दूसरे काउंटर की तरफ बढ़ते रहे। मेरी आंखें उन्हें देख रही थीं। वे प्रत्येक डिश का पूरा वर्ण कर रही थीं।
सज्जन पूरा वर्णन सुनते, खाद्य पदार्थ की कल्पना करते, नाक में पहुंचती खशबू से मिलान करते और अपना फैसला करते, जिसके मुताबिक वे खाद्य पदार्थ को उठाकर प्लेट में रखतीं। धीरे-धीरे दो और महिलाएं उनके साथ आ गईं। और उनके साथ उनका व्यवहार भी पहले वाली महिला जैसा था- कोमलता से उनका हाथ पकड़ने से लेकर देखभाल करने तक। मेरी ‘देखने वाली’ आंखें यह कहने के साथ टिमटिमाने लगी ‘गोपियों के साथ कृष्ण।’ लेकिन जब मैंने उन्हें पढ़ना शुरू किया तो पता चला कि जब वे बात करतीं तो हर तरह से परफेक्ट वह व्यक्ति आंखें घुमाने की बजाय अपने कान उनकी तरफ करता। आश्चर्य न करें कि कोई आंखें घुमाए बिना कान कैसे घुमा सकता है। यदि आपने 90 या 95 फीसदी दृष्टि खो चुके व्यक्ति के साथ कुछ घंटे बिताए हों तो आप जान जाएंगे कि वे इसे कैसे करते हैं।
वे व्यक्ति थे सुधाकर देवगुप्ता सिद्धहस्त एसबीआई मैनेजर जो स्टेट बैंक लर्निंग सेंटर ऑफ त्रिपाठी पर ट्रेनिंग दे रहे थे, जहां लाखों एसबीआई कर्मचारियों को निखारा जाता है। अन्य महिलाएं उनके 50 सहयोगियों का हिस्सा थीं, जो ‘ट्रेन द ट्रेनर्स प्रोग्राम’ में शामिल थीं, जो इंदौर के रैपिड लर्निंग सेंटर पर आयोजित था। जब मैंने त्रिपाठी लर्निंग सेंटर पर ईश्वर के इतने करीब रहने के लिए उन्हें बधाई दी तो उन्होंने कहा, ‘मैं हर दिन उसे अपने भीतर महसूस करता हूं!’ और मैंने सोचा यही वजह है कि सारी विवाहित महिलाएं उनके हाथ, हाथों में ले रही हैं, उनकी देखभाल कर रही हैं, क्योंकि वे ईश्वर के दृष्टिहीन प्रतिनिधि हैं जो किसी के प्रति भेदभाव नहीं रखते।
गुरुवार को जल्दी सुबह पचास पार की शुरुआती उम्र वाला वह युगल जिस तरह से सितारा दर्जे वाले होटल के उस रेस्तरां में आया, तो मेरे दिल ने कहा,‘ यह युगल अलग है, उसे पढ़ो’! पुरुष ने अपना हाथ पहले ही उन्हें सौंप रखा था और वे कोमलता से थामे हुई थीं। आप इस तरह के रिश्ते केवल फिल्मों के योजनाबद्ध फ्रेम में या उन युगलों में देखते हैं, जिनमें विशुद्ध प्रेम होता है। उनकी आंखें युवावस्था में जरूर सुंदर रही होंगी और आज वे सिकुड़ गई थीं। कंप्यूटर के जरूरत से ज्यादा उपयोग अथवा उम्र के कारण होगा। लेकिन, उनमें प्रेम और करुणा कम नहीं हुई थी। वे कोई खाली टेबल इस तरह से देख रही थीं जैसे कोई मां जाकर नश्ता लाने के पहले बच्चे को सुरक्षित बैठा देना चाहती हो। चूंकि यह रेस्तरां का व्यस्तता का वक्त था, कोई खाली टेबल खोजना थोड़ा कठिन था। इसके पहले कि मैं उन्हें इशारा करता कि मेरे निकट की टेबल खाली है, उनकी मछलियों जैसे आंखों ने उसे देख लिया। उन्होंने पुरुष साथी की कलाई को कसकर पकड़ा और टेबलों में से रास्ता निकालते हुए मेरे निकट तक पहुंचीं। उन्हें बिठाया और कहा, ‘मैं आपके लिए नाश्ता ला देती हूं।’ साफ रंग के स्मार्ट दिखाई दे रहे सज्जन ने सिर हिलाया। लेकिन, अचानक उन्होंने अपना फैसला बदला और उनसे कहा, ‘आप मेरे साथ आइए ताकि आप अपनी पसंद के नाश्ते का चुनाव कर सकें।’ उन सज्जन ने अपना हाथ उठाया जैसे कोई बच्चा मां से कहा रहा हो, ‘तो फिर मुझे ले चलो।’ मुस्कराते चेहरे के साथ उन्होंने उनका हाथ थामा, फिर से बहुत कोमलता के साथ और उन्हें काउंटर्स पर ले गईं, जहां विभिन्न डिश थीं दो प्लेट लेने की बजाय उन्होंने एक प्लेट ली और वे एक से दूसरे काउंटर की तरफ बढ़ते रहे। मेरी आंखें उन्हें देख रही थीं। वे प्रत्येक डिश का पूरा वर्ण कर रही थीं।
सज्जन पूरा वर्णन सुनते, खाद्य पदार्थ की कल्पना करते, नाक में पहुंचती खशबू से मिलान करते और अपना फैसला करते, जिसके मुताबिक वे खाद्य पदार्थ को उठाकर प्लेट में रखतीं। धीरे-धीरे दो और महिलाएं उनके साथ आ गईं। और उनके साथ उनका व्यवहार भी पहले वाली महिला जैसा था- कोमलता से उनका हाथ पकड़ने से लेकर देखभाल करने तक। मेरी ‘देखने वाली’ आंखें यह कहने के साथ टिमटिमाने लगी ‘गोपियों के साथ कृष्ण।’ लेकिन जब मैंने उन्हें पढ़ना शुरू किया तो पता चला कि जब वे बात करतीं तो हर तरह से परफेक्ट वह व्यक्ति आंखें घुमाने की बजाय अपने कान उनकी तरफ करता। आश्चर्य न करें कि कोई आंखें घुमाए बिना कान कैसे घुमा सकता है। यदि आपने 90 या 95 फीसदी दृष्टि खो चुके व्यक्ति के साथ कुछ घंटे बिताए हों तो आप जान जाएंगे कि वे इसे कैसे करते हैं।
वे व्यक्ति थे सुधाकर देवगुप्ता सिद्धहस्त एसबीआई मैनेजर जो स्टेट बैंक लर्निंग सेंटर ऑफ त्रिपाठी पर ट्रेनिंग दे रहे थे, जहां लाखों एसबीआई कर्मचारियों को निखारा जाता है। अन्य महिलाएं उनके 50 सहयोगियों का हिस्सा थीं, जो ‘ट्रेन द ट्रेनर्स प्रोग्राम’ में शामिल थीं, जो इंदौर के रैपिड लर्निंग सेंटर पर आयोजित था। जब मैंने त्रिपाठी लर्निंग सेंटर पर ईश्वर के इतने करीब रहने के लिए उन्हें बधाई दी तो उन्होंने कहा, ‘मैं हर दिन उसे अपने भीतर महसूस करता हूं!’ और मैंने सोचा यही वजह है कि सारी विवाहित महिलाएं उनके हाथ, हाथों में ले रही हैं, उनकी देखभाल कर रही हैं, क्योंकि वे ईश्वर के दृष्टिहीन प्रतिनिधि हैं जो किसी के प्रति भेदभाव नहीं रखते।
फंडा यह है कि  यदि आप अपनी आंखों को देखने के अलावा पढ़ना भी सिखाएं तो आपको इस दुनिया में कई दिव्य रिश्ते दिखाई देंगे!
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु
raghu@dbcorp.in
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु
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