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चार साल से आंगन मेंे पेड़ पर टांग रखी है पति की अस्थियां

3 वर्ष पहले
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22 अप्रैल को लोक अदालत है। इसमें संभव है कि 5 साल पहले आया एक प्रकरण वापस आए। यह प्रकरण है कि लिव इन रिलेशन में रहकर प|ी का अधिकार पाने वाली रामकुमारी का। इन्हें लिव इन इन रिलेशन में रहने के बावजूद प|ी के अधिकार तो मिल गए। कुछ दिन साथ रहे थे कि पति की मौत हो गई। उसके बाद इन्हें अन्य हक नहीं मिले। इन्होंने भी न्याय के लिए जिद करते हुए पति की अस्थियां घर के आंगन पर पेड़ पर टांग दी। यह हक के लिए न्यायालय में लड़ भी रहीं हैं। रामकुमारी का कहना है कि न्यायालय से हक मिलने और पैसा होने के बाद वे पति की अस्थियां विसर्जित करने प्रयागराज इलाहाबाद जाएंगी।

न्यायालय ने प|ी का अधिकार तो दिया, पहली प|ी व उसके भाईयों ने नहीं दिया हक, रुपए व संपत्ति नहीं दी

क्योंकि... नहीं मिला संपत्ति में अिधकार, अब लोक अदालत से उम्मीद

रामकुमारी मंडला की रहने वाली हैं बहन प्यारी की शादी मंडला के ही रहने वाले बसंत के बड़े भाई दुलीचंद से हुई। बसंत प्रधान की खंडवा जिले में पटवारी की नौकरी लग गई। उसकी शादी नाहल्दा के की शांति से हुई। बाद में पता चला कि व प|ी मानसिक रूप से कमजोर है। बसंत के बड़े भाई दुलीचंद ने रामकुमारी के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। हामी भर दी। बसंत के हाथों से चूडिय़ां पहनकर 2003 में प|ी बनकर रुस्तमपुर आई। घर संभाला। सबकुछ ठीक चल रहा था। शांति के घर वालों का दखल खत्म हो गया। वे विवाद करने लगे। कहा कि मेरे बच्चे होंगे तो मैं शांति के बच्चों का ध्यान नहीं रखूंगी। मैंने बच्चे न पैदा करने का संकल्प लिया। नसबंदी कराई। शांति ने अपने मायके वालों के कहने पर 2011 में शिकायत कर दी। दो साल तक केस चला। तत्कालीन न्यायाधीश गंगाचरण दुबे ने जांच कराई। मामला कुटुंब न्यायालय से होता हुआ दिसंबर 2013 में में लोक अदालत में गया। तीनों पक्षों की सहमति से न्यायाधीश दुबे ने समझौता कराया। सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर लिव इन रिलेशनसिप को मान्यता देते हुए रामकुमारी को भी दूसरी प|ी का दर्जा दिया। साथ ही संपत्ति को तीन हिस्सों में बांटने के आदेश दिए। इसके एक महीने बाद जनवरी 2014 में बसंत को लकवा लगा। दिसंबर 2014 में हार्ट अटैक आया। उनकी मौत हो गई। पति की अंतिम इच्छा थी कि उसकी अस्थियां गंगा में विसर्जित हों। इसलिए मैंने कुछ प्रमुख अस्थियां मटके में रखकर पेड़ पर टंगवा ली। मैंने कोर्ट में केस लगाया है। अब मैं सोच रहीं हूं कि लोक अदालत में वापस जाकर न्याय मांगूंगी। नहीं मिला तो ऊपर की अदालत में जाऊंगी।

पेड़ पर टंगी अिस्थयां।

लड़का मेरे पास रह रहा

शांति का लड़का पूर्णानंद मेरी शादी के समय 2 साल का था। तब से वह मेरे साथ ही रह रहा है। उसे हासिल करने के लिए शांति व उनके घर वालों ने केस लगाया है, ताकि लड़के को हासिल करके मुझे भगा सकें। लड़का उनके साथ नहीं जाना चाहता।

फैसले के आधार पर मिल सकता है हक

महिला लोक अदालत में दिए फैसले के आधार पर न्यायालय में जाकर संपत्ति में बंटवारा करा सकती है। वह पति की मौत पर शासन से मिले रुपए व अन्य सुविधाओं की भी अधिकारी है। -देवेंद्र यादव, अधिवक्ता

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