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झाेपड़ी में चिमनी की रोशनी में पढ़ाई की, खेतों में मजदूरी भी, 12वीं के रिजल्ट में 94.4% के साथ टॉप पर पायल

3 वर्ष पहले
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टूटी सी झोपड़ी में रहने आदिवासी छात्रा कच्चे रास्ते से दो किमी दूर हर दिन स्कूल गई। दिन में माता-पिता के साथ खेतों में मजदूरी तो रात में चिमनी की रोशनी में पढ़ाई की। रिजल्ट आया तो वह स्कूल की टॉपर बन गई। उसने 500 में 472 अंक प्राप्त कर 94.4% रिजल्ट बनाया। छात्रा को और सुविधाएं मिलती तो वह और उसके साथी विद्यार्थी स्कूल ही नहीं प्रदेश और जिले में भी पहला और दूसरा स्थान बना सकते थे।

खंडवा ब्लाक की शासकीय हाईस्कूल भकराड़ा की छात्रा पायल पिता प्रताप अनारे ने 10वीं की परीक्षा में बिना कोचिंग यह सफलता पाई है। पायल बेहद गरीब आदिवासी परिवार से है और पेशा मजदूरी है। शिक्षक राजेश चौकसे ने बताया पायल का घर स्कूल से करीब दो किमी दूर है। बावजूद वह उबड़ खाबड़ रास्ते से सालभर स्कूल आई और पढ़ाई की। पढ़ाई के साथ-साथ उसने माता-पिता के साथ खेतों में मजदूरी भी की। एक छोटे से टप्पर में रहकर चिमनी की राेशनी में पढ़ाई की। अव्वल आकर पायल ने साबित कर दिया कि अभावों के बीच भी सफलता पाई जा सकती है।

शासकीय हाईस्कूल भकराड़ा की आदिवासी छात्रा ने अभावों के बीच पाई सफलता, स्कूल में 50 में 43 विद्यार्थी पास

यहाँ होनहार विद्यार्थी ही कमजोर बच्चों की समस्या को हल करते हैं

आजमाई यह ट्रिक

शिक्षक राजेश चौकसे ने बताया जुलाई में बच्चों के प्री-टेस्ट लेकर कमजोर व होनहार बच्चे निकाले फिर 5-5 बच्चों का ग्रुप बनाकर पढ़ाई करवाई। अर्ध वार्षिक परीक्षा में स्कूल का रिजल्ट 75% रहा। वार्षिक में 100% रहा। कमजोर 4 के साथ 1 होनहार विद्यार्थी को रखकर पढ़ाया। होनहार स्टूडेंट ही कमजाेर बच्चों की समस्या काे हल करवाते। यह ट्रिक काम आ गई और 22 बच्चे प्रथम श्रेणी में पास हुए।

माता-पिता के साथ खेत में मजदूरी करती पायल।

43 विद्यार्थी पास हुए, इसमें से 22 प्रथम श्रेणी में

स्कूल में कक्षा 10वीं में दर्ज 50 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी थी, जिसमें 43 विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए। 22 ने प्रथम स्थान बनाया। शेष दूसरे व तीसरे स्थान पर रहे। इसी कक्षा के छात्र मयूर संजय भुजबल की कहानी भी पायल की तरह है। मजदूर के बेटे मयूर ने एक कमरे के कच्चे मकान में रहकर पढ़ाई की। परीक्षा में उसे 91.6% अंक मिले और वह शाला में दूसरे नंबर पर रहा।

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