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सवा एकड़ में गेहूं के डंठल जलाने से नष्ट हो गए साढ़े 23 किलो नाइट्रोजन, 9 किलो फास्फोरस व 79 किलो पोटाश

3 वर्ष पहले
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मेनगांव क्षेत्र के एक किसान ने सवा हेक्टेयर रकबे में गेहूं कटाई बाद बुधवार सुबह 10 बजे उसके डंठल जला दिए। खेत खरगोन-इंदौर रोड से लगा होने से सैकड़ों वाहन चालक धुएं से परेशान हुए। खेत की मेंढ के आसपास आग फैल गई। पुलिस ने सूचना देकर नपा का अग्निशामक बुलाकर आग पर काबू पाया।

भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र की नरवाई जलाने की रिपोर्ट के मापदंड के मुताबिक सैकड़ों तरह के खेती के मित्र कीट नष्ट हुए। सवा हेक्टेयर गेहूं के खेत में 23.525 किग्रा नाइट्रोजन, 9.05 किग्रा फास्फोरस व 79.35 किग्रा पोटाश नष्ट हो गया। पर्यावरण में तापमान बढ़ने के साथ 7575 किग्रा कार्बन डाईऑक्साइड व 458.75 किग्रा कार्बन मोनोआक्साइड उत्सर्जित हुआ।



ऐसे हो रहा है घाटा... प्रति एकड़ करीब दो हजार रु. पोटाश, 600 रु. नाइट्रोन व 200 रु. कीमत के फास्फोरस का नुकसान

ऐसी है भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के नरवाई को लेकर एक शोध के बाद पिछले माह एक रिपोर्ट जारी की। उसके मुताबिक एक हेक्टेयर की नरवाई जलाने से 18.82 किग्रा नाइट्रोजन, 7.24 किग्रा फास्फोरस और 63.48 किग्रा पोटाश का नुकसान होता है। इसके अलावा 6060 किग्रा कार्बन डाईआक्साइड, 367 किग्रा कार्बन मोनोआक्साइड गैसे उत्सर्जित होती है।

वैधानिक प्रावधान भी है पर एक भी कार्रवाई नहीं

इसके अलावा खेतों में नरवाई जलाना जिला कलेक्टर द्वारा धारा 144 में प्रतिबंधित हैं। नरवाई में आग लगाने पर पुलिस केस दर्ज कर सकती है। मप्र शासन के नोटिफिकेशन 15 मई 2017 में निषेधात्मक निर्देश जारी किए हैं। उल्लंघन पर व्यक्ति, निकाय को प्रावधान अनुसार दो एकड़ से कम भूमि रखने वाले को ढाई हजार प्रति घटना पर्यावरण क्षतिपूर्ति, दो से पांच एकड़ भूमि रखने वाले को पांच हजार प्रति घटना क्षतिपूर्ति एवं पांच एकड़ से अधिक भूमि रखने वाले को 15 हजार प्रति घटना पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि देना होगी।

फसल कटाई के बीच खेतों में बचे ठंडलों को किसानों ने जला दिया। धुएं से वाहन चालकों का निकलना मुश्किल हो गया। परेशानी को देखते हुए नपा के अग्निशामक ने पहुंचकर आग बुझाई।

फायदा : पशु आहार व जैविक खाद बनाकर उपयोग में लें

जैव विविधता बनी रहती है। जमीन में मौजूद मित्र कीट शत्रु कीटों को खा कर नष्ट कर देते हैं। जमीन में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है, जिस से फसल उत्पादन ज्यादा होता है। दलहनी फसलों के अवशेषों को जमीन में मिलाने से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे उत्पादन भी बढ़ता है। रोटावेटर चलाकर नरवाई को बारीक कर मिट्टी में मिलाया जा सकता है। जैविक खाद बनेगा।

नुकसान : मर जाते हैं सैकड़ों मित्र कीट

नरवाई जलाने से खेत में मौजूद कई प्रजातियों के मित्र कीट मर जाते हैं। जैव विविधता खत्म होती है। सूक्ष्म जीव जलकर नष्ट हो जाते हैं। जैविक खाद का निर्माण बंद हो जाता है। जमीन कठोर हो जाती है, जिससे जल संधारण घट जाती है। पर्यावरण बिगड़ता है। तापमान बढ़ता है। कार्बन से नाइट्रोजन व फास्फोरस का अनुपात घटता है। उर्वरा शक्ति घटती है। ये कीट जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में सहायक होते हैं। मेढ़ पर लगे पेड़-पौधे जल जाते हैं। आग फैलने से जन-धन हानि की आशंका रहती है।

नरवई जलाने से मित्र कीटों के नष्ट होने व पर्यावरण को नुकसानी के बारे में संगोष्ठियों में बताते रहते हैं। डंठल नष्ट करने की तरकीब पर ध्यान देना चाहिए। एमएल शर्मा, सह संचालक आंचलिक अनुसंधान केंद्र

रोटावेटर से कटाई के बाद छह इंच तक के डंठल रह जाते हैं। परेशानी होने से कुछ किसान जलाते हैं। उन्हें ऐसा न करने को बता रहे हैं। - श्यामसिंह पंवार, जिलाध्यक्ष भारतीय किसान संघ

तो नहीं पड़ेगी जलाने की जरूरत

गेहूं उत्पादन का करीब 1.5 गुना भूसा होता है।नरवाई से भूसा बना सकते हैं। इससे करीब 3000 रुपए प्रति हेक्टेयर का लाभ कमा सकते हैं। जहां कंबाईन हार्वेस्टर से फसल कटाई होती है। वहां हार्वेस्ट के साथ स्ट्रारीपर एवं रीपर कम बाईडर के उपयोग कर फसल को काफी नीचे से काटा जा सकता है। तब नरवाई जलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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