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बिना शास्त्री-आचार्य डिग्री के भी बन जाएंगे संस्कृत के विशेषज्ञ, संशोधित नियमों से भर्ती पर हुआ बवाल

3 वर्ष पहले
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राज्य सरकार के संशोधित सेवा नियमों के तहत संस्कृत शिक्षा में होने वाली भर्तियों ने बवाल खड़ा कर दिया है। दरअसल अब बिना आचार्य-शास्त्री की परंपरागत डिग्री हासिल किए हुए अभ्यर्थी भी प्रिंसिपल, प्रधानाध्यापक, प्राध्यापक जैसे पदों के योग्य हो जाएंगे। नई होने वाली भर्तियों में प्राध्यापक की योग्यता में मात्र संस्कृत में एमए किए हुए अभ्यर्थी को भी योग्य मान लिया गया है। कोई भी व्यक्ति जिसने किसी भी विषय से स्नातक किया हो यदि वह संस्कृत में एमए कर लेता है तो विषय विशेषज्ञ के रूप में प्राध्यापक के योग्य हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संस्कृत के पारंपरिक ज्ञान से सीधे तौर पर खिलवाड़ है। संस्कृत शिक्षा विभाग के सेवा नियम 2015 में संशोधन का बड़ा असर वरिष्ठ अध्यापक एवं प्राध्यापक पदों की भर्ती प्रक्रिया में नजर आने लगा है। इसके तहत मात्र विषय विशेष में एमए किए हुए को योग्य मान लिया गया है। ये भर्तियां राज्य लोक सेवा आयोग की ओर से की जा रही हैं। ऐसी स्थिति में संस्कृत स्कूलों में पहली कक्षा से संस्कृत विषय का पारंपरिक अध्ययन करने वाले विद्यार्थी तथा किसी भी विषय का बीए पास संस्कृत में एमए करने वाला समकक्ष मान लिया जाएगा। विभाग में प्रधानाचार्य पदों के लिए पिछली बार जो डीपीसी हुई है उसका भी रिव्यू संभव है। ऐसे में संशोधित नियमों को आधार बनाया गया तो न केवल पदोन्नत अधिकारियों को नुकसान होगा बल्कि प्राध्यापकों की नई भर्ती भी वैकेंसी नहीं होने के चलते मुश्किल हो जाएगी।

संस्कृत शिक्षा का ये कैसा हश्र ? विशेषज्ञों ने कहा-आचार्य-शास्त्री की डिग्री का कद घटा तो संस्कृत की लोकप्रियता होगी खतरे में। प्रमोशन सिस्टम भी गड़बड़ाएगा
ये हो गया
संशोधन के तहत पूर्व की सभी योग्यताओं को दरकिनार करते हुए प्रधानाचार्य के लिए सामान्य संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएट को शामिल कर दिया गया है। प्रधानाध्यापक के लिए ग्रेजुएट की अनिवार्यता। अनुभव के रूप में किसी भी विषय को पांच वर्ष तक पढ़ाने का। पहले संस्कृत को पढ़ाने का अनुभव जरूरी था। संशोधन से प्रमोशन भी प्रभावित होंगे।

नुकसान
पारंपरिक संस्कृत शिक्षा के जानकारों का कहना है कि कोई भी विद्यार्थी संस्कृत स्कूलों में प्रवेश इसलिए लेता था क्याेंकि या तो वह आयुर्वेद डॉक्टर बन सके या संस्कृत शिक्षा में प्रधानाचार्य, प्रधानाध्यापक, संभागीय शिक्षाधिकारी, सहायक निदेशक, उपनिदेशक जैसे पदों पर पहुंच सके। अब इन पदों पर संस्कृत का ठोस अध्ययन न जानने वाला भी संस्कृत शिक्षा में प्रशासनिक पद हासिल कर जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति में आखिर कोई क्यों संस्कृत का शास्त्रीय अध्ययन करेगा? उनका तर्क है कि इससे संस्कृत स्कूलों में पढ़ने के लाभ को ही खत्म कर दिया है। दूसरे अर्थों में कहें बिना गणित पढ़े ही इंजीनियर तैयार करने जैसा है यह संशोधन। इस संशोधन के बाद संस्कृत का पारंपरिक अध्ययन करने वालों के लिए उच्च पदों के अवसर काफी हद तक कम हो जाएंगे।

संस्कृत शिक्षा में नियम कायदों में संशोधन आखिर क्यों किए गए यह समझ से परे है। इससे साफतौर पर लगता है कि सरकार पारंपरिक संस्कृत को बढ़ावा देना नहीं चाहती। इस मामले में हमने केंद्र तक शिकायत की है। -वीरेंद्र बहादुर सिंह, प्रदेशाध्यक्ष, राजस्थान संस्कृत शिक्षा विभागीय शिक्षक संघ

प्रिंसिपल, प्रधानाचार्य के लिए आचार्य, शास्त्री जैसी अर्हताओं को दरकिनार करना संस्कृत के लिए बड़ा खतरा है। संशोधित नियमों को व्यावहारिक नहीं बनाया गया है। इससे प्रमोशन सिस्टम गड़बड़ाएगा तो नई भर्तियों पर भी संकट आएगा। -सियाराम शर्मा, प्रदेशाध्यक्ष, राजस्थान शिक्षक संघ

संस्कृत शिक्षा का मूल स्वरूप तभी बना रहेगा जब उच्च पदों पर इस विषय के विशेषज्ञ होंगे। नियमों में किसी भी तरह का बदलाव सरकार का क्षेत्राधिकार है। यह सही है या गलत, मेरी टिप्पणी उचित नहीं होगी। नियमों में संशोधन के बाद कई तर्क-वितर्क सामने आ रहे हैं। - भास्कर शर्मा, ज्वाइंट डायरेक्टर, संस्कृत शिक्षा निदेशालय

जिससे हो रहा विवाद
संस्कृत का ठोस अध्ययन न करने वाला भी प्रशासनिक पद हासिल करेगा

संस्कृत सेवा नियमों के तहत यह रहा है प्रावधान
संस्कृत शिक्षा नियम 2015 के तहत प्रधानाचार्य के लिए पारंपरिक शास्त्री एवं आचार्य होना आवश्यक था। मतलब लगातार पांच वर्ष का संस्कृत के शास्त्रों को पढ़ने का अनुभव तथा सात साल तक स्कूल में संस्कृत पढ़ाने का अनुभव। तभी वह प्रधानाचार्य के योग्य बन सकता है। प्रधानाध्यापक के लिए पारंपरिक शास्त्री होना जरूरी था। मतलब लगातार तीन साल संस्कृत के शास्त्रों को पढ़ने का अनुभव तथा पांच साल तक स्कूल में संस्कृत विषय पढ़ाने का अनुभव होना जरूरी था।

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