करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच
पंकज तिवारी,25
शोधार्थी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
Pankaj2412tiwari@gmail.com
हम चीन से मुकाबला करने की बात करते हैं और पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक फ्लाईओवर का निर्माण नहीं कर पा रहे हैं। यह फ्लाईओवर शहर के सबसे व्यस्ततम रोड कैंट पर बन रहा है, जहां रेलवे स्टेशन है। रोजाना हजारों वाहन गुजरते हैं। निर्माणाधीन फ्लाईओवर के कारण लोग घंटों जाम में फंसे रहते हैं। धूल-धुआं खाते हैं। फ्लाईओवर का बीम गिरने से जो दर्दनाक हादसा हुआ है वो यह संकेत दे रहा है कि फ्लाईओवर नहीं हमारा जमीर गिरता जा रहा है। बनारस की सड़कों को जहां-तहां बेतरकीब ढंग से खोद दिया जाता है। खुदाई का न तो कोई योजनाबद्ध तरीका होता है और न ही कोई तयसीमा। इनसे बन गड्ढों के कारण रोज छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं होती रहती हैं लेकिन, कोई सुध लेने वाला नहीं। सड़कों पर उड़ती धूल से यहां के 80 प्रतिशत लोगों को सांस की बीमारियां हैं।
सड़कों के टैफिक को देखकर ‘आपको नीड फॉर स्पीड’ गेम की याद आ जाएगी, जहां गाड़ी चलाने का कोई नियम नहीं है। कोई दाएं से जा रहा है तो कोई उल्टे रास्ते। कभी कभी बाएं चलते हुए यह भ्रम हो जाता है कि कहीं आप ही गलत तो नहीं चल रहे। बनारस के घाट पर नौका विहार पर्यटन की जान है लेकिन, बिना लाइफ जैकेट के नौका चलाने का लाइसेंस दिया जा रहा है। क्या हम विदेशी सैलानियों और पर्यटकों के बीच बनारस की इसी अल्हड़ छवि को पेश करना चाहते हैं।
जो आज भी बनारस के साहित्यिक सौंदर्य में जी रहे हैं, मेरी बात शायद उन्हें अच्छी न लगे, क्योंकि वे आज के बनारस की हकीकत नहीं देखना चाहते। वे उस बनारस को देखते हैं, जिसका साहित्य में गुणगान किया गया है- न पेरिस में न फारस में जियो राजा बनारस में। पान खाकर सड़कों पर थूकते हुए वे दलील देते हैं कि यह बनारस की संस्कृति है। आप इसे कैसे खत्म कर देंगे। अब आप खुद समझ सकते हैं कि क्यों बनारस दुनिया के प्रदूषित शहरों में शामिल है। अभी भी वक्त है बनारस की विरासत ढोने से अच्छा है हम इसके वर्तमान को ठीक करें। इसे साफ, सुंदर, सुरक्षित शहर बनाएं। रोज सड़कों पर कीड़ों-मकौड़ों की तरह रेंगने से बनारस स्मार्ट नहीं बनेगा बल्कि हमें भी स्मार्ट बनना होगा।