राज्य के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल के ‘इंदरलाल डेरेवाला यूरोलोजी लिथोट्रिप्सी सेन्टर’ पर किडनी में से स्टोन को चूरा कर बाहर निकालने वाली लिथोट्रिप्सी मशीन तीन साल से खराब पड़ी है। जिसके चलते पथरी के ऑपरेशन कराने वाले मरीजों को मजबूरन निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है और महंगे दामों में इलाज कराना पड़ रहा है। एसएमएस अस्पताल में लिथोट्रिप्सी तकनीक से किडनी में स्टोन के इलाज पर 4 से 5 हजार रुपए खर्च होते हैं, जबकि निजी अस्पतालों में यह इलाज पर 40 से 60 हजार रुपए में मिल पाता है। अब सवाल उठता है कि एक तरफ तो एसएमएस अस्पताल करोड़ों रुपए की लागत से रोबोट तकनीक के जरिए ऑपरेशन की तैयारी कर रहा है, वहीं तीन साल में डेढ़ से दो करोड़ रुपए की मशीन क्यों नहीं खरीद पा रहा है? प्रशासन का कहना है कि दिसबंर-2000 में इंदरलाल डेरेवाला ट्रस्ट की ओर से लगाई गई मशीन कंडम हो चुकी है। नई मशीन खरीदने की तैयारी की जा रही है। एसएमएस अस्पताल के यूरोलॉजी आउटडोर में रोजाना आने वाले 300 से ज्यादा मरीजों में से पथरी के आपरेशन वाले 8 से 10 मरीज होते हैं।
एसएमएस अस्पताल के यूरोलोजी विभाग के अधीन लिथोट्रिप्सी सेन्टर का मामला पुरानी मशीन कंडम हुई, डेढ़ से दो करोड़ रुपए लागत की नई मशीन का इंतजार
18 साल पहले बना था सेन्टर
इंदरलाल रामकिशोर डेरेवाला चेरिटेबल ट्रस्ट की ओर से 19 दिसंबर 2000 में पथरी के मरीजों का ऑपरेशन के लिए एसएमएस अस्पताल परिसर में लिथोट्रिप्सी सेन्टर स्थापित किया था।
क्या है लिथोट्रिप्सी
डॉक्टरों के अनुसार मशीन की ऑपरेशन टेबल पर मरीज को लिटाया जाता है। टेबल पर पेट की सीध में पानी से भरा तकिया लगाया जाता है। मशीन से निकलने वाली तरंगों से मरीज की कठोर पथरी का पहले चूरा-चूरा होकर यूरीनरी ट्रेक्ट के माध्यम से बाहर निकल जाती है। मरीज का ऑपरेशन में न तो ज्यादा समय लगता है और ना ही ज्यादा रुकना पड़ा है। किसी तरह के ब्लड की जरुरत तथा किसी तरह के साइड इफेक्ट की भी आशंका नहीं होती।
क्या कहते है जिम्मेदार
पहले वाली मशीन खराब हो चुकी है। मशीन महंगी होने और बजट के चक्कर में लंबे समय से यूरोलॉजी विभाग में लिथोट्रिप्सी की नई मशीन नहीं आ पा रही है। अब जल्द ही मशीन खरीदेंगे।
-डॉ.यू.एस.अग्रवाल,
प्राचार्य, एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर
मशीन खराब पड़ी है। मरीजों की बढ़ती परेशानियों को देखते हुए एसएमएस मेडिकल कॉलेज प्रशासन को दो बार पत्र लिखा जा चुका है।
-डॉ.डी.एस.मीणा, अधीक्षक, एसएमएस अस्पताल
सात-आठ साल पहले लगी लिथोट्रिप्सी मशीन कंडम हो चुकी है। डेढ़ से दो करोड़ रुपए की नई मशीन खरीदने के लिए प्रस्ताव बनाकर भेजा है।
-डॉ. विनय तोमर, निदेशक एवं विभागाध्यक्ष,
यूरोलोजी रिसर्च एवं डवलपमेन्ट सेन्टर