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डॉक्टर के पर्चे पर ही मिलती है टीबी की दवा, खुलेआम बेच रही हैं ऑनलाइन कंपनियां

3 वर्ष पहले
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टीबी की दवाइयों के मिसयूज को लेकर भारत सरकार कड़े कानून बना रही है। आए दिन केमिस्ट्स की कार्यशालाएं हो रही हैं, डॉक्टरों को भी नए नियमों के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इन सब कोशिशों के बावजूद टीबी की दवाइयां ऑनलाइन बिक रही हैं। न डॉक्टर के पर्चे की जरूरत और न ही मरीज की ज्यादा डिटेल की। बस, फोन घुमाओ और दवा मंगा लो।

हाल ही में जब यह शिकायत आई तो भास्कर ने सहायक औषधि नियंत्रक (एडीसी) देवेंद्र कुमार गर्ग को बताया। पहले तो गर्ग मानने को तैयार नहीं हुए, फिर जब पुष्टि करने के लिए उन्होंने कॉल करके दवा मंगाई तो दो दिन में उनके घर पर ही टीबी की दवाइयों की डिलेवरी दे दी गई। बहरहाल, पूरे मामले से एडीसी ने राज्य के ड्रग कंट्रोलर को अवगत कराया है। एक नहीं बल्कि दो बार एडीसी ने ऑर्डर किया और दोनों बार ऑर्डर करने के दो-तीन दिन के अंतराल में उनके घर पर दवा की डिलेवरी कर दी गई। अब सवाल यह है कि सरकार बाजार में दुकानों पर कड़ी निगरानी कर रही है, जबकि शेड्यूल एच-1 की ये दवाइयां ऑनलाइन बिक रही हैं।

दो बार मंगाई दवा, दोनों बार कंपनी ने नहीं मांगा पर्चा

भास्कर की सूचना के बाद एडीसी गर्ग ने लाइफ केयर फार्मेसी के मोबाइल नंबर पर 1 अप्रैल को कॉल किया और रिफांपासिन व आइसोनियाजाइड कॉम्बिनेशन वाले एक ब्रांड के 30 कैप्सूल ऑर्डर किए। कॉल रिसीव करने वाले ने उनसे नाम और एड्रेस पूछा। इतना जरूर कहा कि कौन से डॉक्टर का इलाज चल रहा है तो उन्होंने काल्पनिक तौर पर एक डॉक्टर का नाम बता दिया। इस ऑर्डर के आधार पर 4 अप्रैल को उनके महावीर नगर विस्तार योजना स्थित घर पर दवा पहुंच गई। दोबारा पुष्टि के लिए उन्होंने 9 अप्रैल को फिर से पाइराजीनामाइड साल्ट की 30 टैबलेट ऑर्डर की। मोबाइल नंबर बताने के साथ ही उनका पूरा रिकॉर्ड खुल गया और यह दवा भी 11 अप्रैल को उनके घर भेज दी गई। सबसे हैरतअंगेज यह रहा कि उनसे दोनों ही बार डॉक्टर का पर्चा नहीं मांगा गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए गर्ग ने पूरे प्रकरण से ड्रग कंट्रोलर को अवगत कराया है।

नए नोटिफिकेशन के बाद दवा विक्रेताओं को रखनी होती है 19 कॉलम की सूचना, बिना पर्चे के एडीसी ने एक कॉल पर मंगा ली टीबी की दवाइयां

... और ये हैं नियम : मरीज की आईडी की कॉपी लेना भी जरूरी

खतरनाक है टीबी की दवा का मिसयूज

यह गलत है, सरकार भी कर रही विचार : टीबी ऑफिसर

यह गलत है, नियमों के हिसाब से बिना पर्चे के टीबी की दवाइयां नहीं दी जा सकती। यह बात पहले भी उठी थी और हमने टीबी के लिए नियुक्त डब्ल्यूएचओ के कंसल्टेंट्स को अवगत कराया था। वैसे दिल्ली में इस पर चर्चा चल रही है और जल्द ही भारत सरकार कोई एक्शन लेगी।

- डॉ. रमेश मीणा, जिला क्षय रोग अधिकारी

टीबी की दवाइयों का मिसयूज खतरनाक है। इसीलिए सरकार ने इन दवाइयों के लिए कड़े प्रावधान किए हैं। असल में रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर ही यह तय कर सकते हैं कि किस स्टेज पर मरीज कौन कौन सी दवा दी जाए। क्योंकि ये दवाइयां मरीज के लीवर, किडनी और मानसिक स्थिति आदि पर असर डालती है। साथ ही मरीज में इन दवाइयों को लेकर रेजिस्टेंस डवलप होता है। कई बार सामान्य खांसी-जुकाम में ही टीबी की पहली स्टेज की दवाइयां दे दी जाती हैं, जिनसे मरीज में उनके प्रति रेजिस्टेंस डवलप हो जाता है, फिर मरीज को वह दवाइयां असर नहीं करती।

देवेंद्र गर्ग के घर पर डिलीवर की गई टीबी की दवाइयां।

मैं तो खुद हैरान, उच्चाधिकारियों को बताया : एडीसी

मैं तो खुद हैरान था, क्योंकि एक नहीं, दो बार ऐसा हुआ, जब लाइफ केयर वालों ने मेरे घर पर दवा की डिलेवरी कर दी। मैंने पूरी स्थिति से उच्चाधिकारियों को अवगत कराया है। दवा के साथ जयपुर की एक फर्म का बिल आया था, जो भी मुझे प्रथम दृष्ट्या संदिग्ध लगा।

- देवेंद्र कुमार गर्ग, सहायक औषधि नियंत्रक

टीबी उन्मूलन में जुटी भारत सरकार ने इसी साल 16 मार्च को एक नोटिफिकेशन जारी किया है। इसमें टीबी की 13 तरह की दवाइयों, जांचों व इलाज को लेकर कड़े प्रावधान किए गए हैं। इस नोटिफिकेशन के तहत केमिस्ट को टीबी मरीज की 19 कॉलम की सूचना संधारित करनी होती है और डॉक्टर के पर्चे से लेकर मरीज की आईडी की फोटो कॉपी तक ली जाती है।

इसी तरह इलाज करने वाले डॉक्टर व जांच करने वाली लैब को भी रिकॉर्ड रखना होता है, जो हर माह की 1 तारीख को जिला क्षय रोग अधिकारी को भेजना अनिवार्य है।

... और इसका उल्लंघन करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 269 व 270 के तहत 6 माह से 2 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

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