कोटा के डॉक्टर्स व मेडिकल स्टूडेंट्स ने नॉर्थ ईस्ट के दूरस्थ गांवों में जाकर किया मरीजों का इलाज
नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन (एनएमओ) की धनवंतरि सेवा यात्रा के तहत पूर्वोत्तर राज्यों के सुदूर गांवों में कैंप करने गए काेटा मेडिकल कॉलेज के 8 डॉक्टर व मेडिकल स्टूडेंट्स शुक्रवार को कोटा लौट आए। इन डॉक्टरों व स्टूडेंट्स ने वहां के अनुभव मीडिया से साझा करते हुए बताया कि गांवों से दूर-दूर तक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। लोग खुद भी इलाज को लेकर अवेयर नहीं है। हर 10-15 में से एक पेशेंट मोतियाबिंद का शिकार है, ज्यादातर मरीजों को स्किन की बीमारियां है, पानी में आयरन की मात्रा ज्यादा होने से उदर रोग भी बहुत ज्यादा है। गांव ऐसी-ऐसी जगह पर है, जहां बारिश के समय नदियों में नाव तो छोड़िए, लकड़ी के लट्ठे पर बैठकर दूसरे छोर तक पहुंचना होता है। पांच दिन के ट्यूर से लौटने पर डॉ. विशाल जादौन, डॉ. ऋतुराज भारद्वाज, डॉ. दिव्या मंगल, एमबीबीएस स्टूडेंट निराली कलवार, विशाल गोस्वामी, हुकम सिंह, प्रद्युम्न सिंह व एकांश किरोड़ीवाल का रेलवे स्टेशन पर एनएमओ के जिलाध्यक्ष डॉ. आरएस मालव, उपाध्यक्ष डॉ. सुधीर उपाध्याय आदि ने स्वागत किया।
एनएमओ की ओर से गई टीम का कोटा लौटने पर हुआ स्वागत
असम के विश्वनाथ जिले के कैंप में मरीजों का इलाज करती टीम।
हैल्थ रिपोर्टर|कोटा
नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन (एनएमओ) की धनवंतरि सेवा यात्रा के तहत पूर्वोत्तर राज्यों के सुदूर गांवों में कैंप करने गए काेटा मेडिकल कॉलेज के 8 डॉक्टर व मेडिकल स्टूडेंट्स शुक्रवार को कोटा लौट आए। इन डॉक्टरों व स्टूडेंट्स ने वहां के अनुभव मीडिया से साझा करते हुए बताया कि गांवों से दूर-दूर तक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। लोग खुद भी इलाज को लेकर अवेयर नहीं है। हर 10-15 में से एक पेशेंट मोतियाबिंद का शिकार है, ज्यादातर मरीजों को स्किन की बीमारियां है, पानी में आयरन की मात्रा ज्यादा होने से उदर रोग भी बहुत ज्यादा है। गांव ऐसी-ऐसी जगह पर है, जहां बारिश के समय नदियों में नाव तो छोड़िए, लकड़ी के लट्ठे पर बैठकर दूसरे छोर तक पहुंचना होता है। पांच दिन के ट्यूर से लौटने पर डॉ. विशाल जादौन, डॉ. ऋतुराज भारद्वाज, डॉ. दिव्या मंगल, एमबीबीएस स्टूडेंट निराली कलवार, विशाल गोस्वामी, हुकम सिंह, प्रद्युम्न सिंह व एकांश किरोड़ीवाल का रेलवे स्टेशन पर एनएमओ के जिलाध्यक्ष डॉ. आरएस मालव, उपाध्यक्ष डॉ. सुधीर उपाध्याय आदि ने स्वागत किया।
बात करने के लिए ट्रांसलेटर की ली मदद: डॉ. विशाल जादौन ने बताया कि पूरे देश से टीमें पहले गुवाहाटी एकत्र हुई, फिर वहां से अलग-अलग टीमाें के रूप में हमें गांवों में भेजा गया। कोटा से गए सदस्यों को असम के विश्वनाथ, अरुणाचल प्रदेश के नामसय तथा मेघालय के जयंतिया हिल्स क्षेत्रों में लगाया गया था। इनमें से कई गांव ऐसे थे, जहां मिसिंग व कारबी जाति के आदिवासी परिवार रहते हैं। लोगों में हाइजीन व सेनिटेशन को लेकर कोई अवेयरनेस नहीं है। लोगों से बात करने के लिए भी ट्रांसलेटर की मदद लेनी पड़ी। मेडिकल स्टूडेंट निराली कलवार ने बताया कि महिलाओं को ब्रेस्ट फीडिंग, मेन स्टूल हाइजीन आदि के बारे में जानकारी दी। डॉ. ऋतुराज ने बताया कि बच्चों को डी-वार्मिंग की दवाइयां दी गई। हम अरुणाचल के ऐसे इलाके में थे, जहां के लोग इलाज के लिए असम के तिनसुकिया में जाते थे। वहां 5-6 बजे बाद लोग सो जाते हैं और सुबह की दिनचर्या तड़के 4 बजे से शुरू हो जाती है।