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तीन पीढ़ी से लकड़ी के बेलन बना कर रहे जीवन यापन

3 वर्ष पहले
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करैरा अनुविभाग में करैरा से 40 किमी दूर आमोलपठा व पारागढ़ के घने जंगलों में बसे आदिवासी परिवार पेट की आग बुझाने के लिए लकड़ी के बेलन बनाने का व्यवसाय कर रहे हैं। इन आदिवासियों के पास न तो पैसा है और न ही कोई साधन। ऐसे में तीन पीढ़ियों से ये आदिवासी परिवार जंगल की लकड़ी के बेलन बनाकर अपनी आजीविका कमा रहे हैं। आमोलपठा क्षेत्र के एक सैकड़ा आदिवासी घनघोर जंगलों में रात दिन भटककर जंगली लकड़ी से बेलन बनाने का काम कर रहे हैं ताकि आपके घर में उन्हीं बेलनों से रोटी बन सके। इसके लिए ये आदिवासी साइकिल पर अपनी चलती फिरती बेलन बनाने की मशीन लेकर घूमते हैं। जिससे लोगों को मनमाफिक डिजाइन के रोटी बनाने के बेलन तैयार कर दिए जा रहे हैं। खासबात यह है कि बियावान जंगल में रहने वाले ये आदिवासी परिवार एक दिन में 100 से 150 बेलन बनाकर रोजाना दुकानदारों को बेचकर अपने पेट की आग बुझा रहे हैं।

परंपरा

पेट की आग बुझाने के लिए जंगल से लकड़ी लाकर बनाते हैं बेलन ताकि आप के घर में बन सकें रोटियां

10 से 15 रुपए में खरीदकर व्यापारी कमा रहे हैं मोटा मुनाफा

आमोलपठा व पारागढ़ क्षेत्र के घने जंगलों के बीच एक छोटा सा गांव मार के आदिवासियों का प्रमुख व्यवसाय दुदी व गोदरा जंगल की लकड़ी से बना बेलन है। ये आदिवासी अपनी चलती फिरती बेलन बनाने की मशीन से मनमाफिक डिजाइन के तैयार कर छोटे दुकानदारों को 10 से 15 रुपए में बेच रहे हैं। वहीं इन्हीं बेलनों को दुकानदार 60 से 90 रुपए में बेचकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।

तीन पीढ़ियों से बेलन बनाकर बुझा रहे पेट की आग

मार गांव के कल्याण, रघुवीर, बलवीर, अज्जूराम जैसेे कई आदिवासी परिवार हैं जो पेट की भूख मिटाने के लिए बेलन बनाने का कार्य कर रहे हैं। यही बेलन आपके घर में पहुंचकर रोटियों को आकार दे रहा है। रज्जू जैस परिवारों के लोग अपने परिवार की रोजी रोटी चलाने के लिए बेलन बनाने का कार्य तीन पीढ़ियों से कर रहे हैं और शहर की चमक दमक से दूर जंगलों में जो पैसे मिल रहे हैं। उसी से खुश होकर वे अपनी आजीविका चला रहे हैं।

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