जच्चा-बच्चा की सुरक्षा को लेकर बरती गई जागरुकता का असर दिखने लगा है। सरकार द्वारा हर गर्भवती महिला की अस्पताल में डिलीवरी होने की मुहिम कामयाब होने लगी है। जागरुकता के चलते जिले में होम डिलीवरी की संख्या पिछले साल के मुकाबले घटकर आधी हो गई है। साल 2016-17 में जिलेभर में 100 महिलाओं ने बच्चें को घर में ही जन्म दिया।
वहीं 2017-18 में 53 गर्भवती महिलाओं ने घर में ही डिलीवरी कर बच्चे को जन्म दिया। जच्चा- बच्चा की सुरक्षा को लेकर सितंबर 2017 में प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा योजना शुरू की गई। जिसके मुताबिक हर महीने की 9 तारीख को सीएचसी स्तर पर गर्भवती महिलाओं के लिए चेकअप कैंप निर्धारित है। जिनमें गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच होती है।
शिशु मृत्यु दर में आई कमी: अस्पतालों में डिलीवरी होने के बाद शिशु मृत्यु दर में भी कमी आई है। पुराने समय में स्वास्थ्य संबंधित सुविधाओं के अभाव में गर्भवती महिलाएं बच्चों को घर में ही जन्म देती थी। संक्रमण के कारण अधिकतर बच्चों की मौत हो जाती थी। जागरुकता के चलते शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। बता दें कि जिले में इस समय प्रति हजार बच्चों के पीछे शिशु मृत्यु दर 22 हैं। जोकि पहले 24 थी।
डिलीवरी के 7-10 दिन बाद होती समस्या
विभाग के मुताबिक प्रसव पीड़िता को महीने तक रक्तस्राव व अन्य बीमारियों की संभावना रहती है। 90 फीसदी जच्चा-बच्चा की मृत्यु डिलीवरी के 7-10 दिन के बीच दर्ज की गई है। इसलिए विभाग ने डिलीवरी के 45 दिनों तक निशुल्क एंबुलेंस, जांच व अन्य सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
जच्चा-बच्चा में नहीं फैलता संक्रमण: डॉ. सिंह
जिला प्रतिरक्षण अधिकारी डॉ. अनुपमा सिंह ने कहा कि घरों में डिलीवरी के कारण जच्चा-बच्चा में संक्रमण की मात्रा बढ़ जाती है। जोकि जच्चा व बच्चा दोनों के लिए नुकसानदायक होता है। सिंह ने कहा कि गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में ही डिलीवरी करानी चाहिए। उन्होंने कहा कि 99 प्रतिशत डिलीवरी अस्पताल तथा 1 फीसदी घर पर होती है। घर पर कराई गई डिलीवरी से पीड़िता के एचबी टेस्ट, संक्रमण व अन्य जांच संभव नहीं होती। जच्चा व बच्चा को इंफेक्शन होने की संभावना रहती है। ऐसी स्थिति में आशा या एएनएम को मरीज तुरंत अस्पताल में रेफर करना चाहिए।