पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • आज से पुरुषोत्तम मास, भक्ति व पुण्य कर्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ

आज से पुरुषोत्तम मास, भक्ति व पुण्य कर्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
इस वर्ष का पुरुषोत्तम मास 16 मई से 13 जून तक रहेगा। हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है। जिसे अधिकमास, मल मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में इस माह का अपना विशेष महत्व है। इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवद् भक्ति, व्रत-उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्य किए जाते हैं। मान्यता है कि मल मास में किए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए पूजा-पाठ से 10 गुना अधिक फल मिलता है।

सूर्य व चंद्र के बीच बनाता है संतुलन: श्री दुर्गा देवी मन्दिर पिपली के पीठाधीश डॉ. सुरेश मिश्रा के मुताबिक अधिकमास- वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार भारतीय ज्योतिष में सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है। इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है। वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग एक मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को पूर्ण करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है।

मल मास में पवित्र कर्म वर्जित

हिंदू धर्म में अधिकमास में पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। माना जाता है कि अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन होता है। इसलिए इस मास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि नहीं किए जाते हैं। इस मास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। इसी लिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

अधिकमास का महत्व

हिंदू धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव पंचमहाभूतों से मिलकर बना है। इन पंचमहाभूतों में जल, अग्नि, आकाश, वायु और पृथ्वी सम्मिलित हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप ही ये पांचों तत्व प्रत्येक जीव की प्रकृति न्यूनाधिक रूप से निश्चित करते हैं। अधिकमास में समस्त धार्मिक कृत्यों, चिंतन- मनन, ध्यान, योग आदि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित इन पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। इस तरह अधिकमास के दौरान किए गए प्रयासों से व्यक्ति हर तीन साल में स्वयं को बाहर से स्वच्छ कर नई ऊर्जा से भर जाता है। अधिकमास में व्रत- उपवास, पूजा- पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन ,यज्ञ- हवन के अतिरिक्त श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्य पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं। इसीलिए विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है।

खबरें और भी हैं...